4,20,000 साल पहले की रहस्यमयी मानव प्रजाति की हुई खोज, खोपड़ी से खुला राज :

पुरातत्वविज्ञानियों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने मनुष्यों के विकास की कहानी के एक लापता हिस्से की खोज की है. इजराइल के नेशेर रामला में खुदाई में एक खोपड़ी मिली है जो संभवत: एक अलग होमो आबादी के अंतिम बचे मानव का उदाहरण हो. यह आबादी करीब 4,20,000 से 1,20,000 साल पहले अब के इजराइल में रहती थी.

इजराइल के अनुसंधानकर्ता हर्शकोवित्ज, योशी जेदनर और सहकर्मियों ने ‘साइंस’ में प्रकाशित अध्ययनों में बताया कि इस आदिकालीन मानव समुदाय ने कई हजार वर्षों तक निकटवर्ती होमो सैपियंस समूहों के साथ अपनी संस्कृति और जीन साझा किए.

यहां मिले नए जीवाश्म

खोपड़ी के पीछे के हिस्सों समेत अन्य टुकड़ों और लगभग एक पूरे जबड़े के विश्लेषण से पता चलता है कि यह जिस व्यक्ति का अवशेष है वह पूरी तरह होमो सैपियंस नहीं था. ये अवशेष 1,40,000-1,20,000 वर्ष पुराने हैं. न ही ये होमो वंश के विलुप्त सदस्य निएंडथरल मानव के थे. ऐसा माना जाता है कि उस समय इस क्षेत्र में केवल अन्य इसी तरह का मानव रहता था. इसके बजाय यह व्यक्ति होमो के एक विशिष्ट समुदाय का लगता है जिसकी पहचान विज्ञान ने पहले कभी नहीं की.

कई अन्य जीवाश्म मानव खोपड़ियों से विस्तारपूर्वक तुलना करने पर अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि खोपड़ी के पीछे की हड्डी पुरातनकालीन विशेषताओं वाली है जो शुरुआती और बाद के होमो सैपियंस से अलग है. यह हड्डी निएंडथरल और शुरुआती होमो सैपियंस में पायी हड्डियों के मुकाबले थोड़ी मोटी है.

इसका जबड़ा भी पुरातनकालीन विशेषताओं वाला है लेकिन यह निएंडथरल में पाए जाने वाले जबड़ों जैसा है। हड्डियां आदिकालीन और निएंडथरल का विशिष्ट मिश्रण दिखाती है।

क्या इनके और भी लोग हैं?

लेखकों ने संकेत दिया कि इजराइल के अन्य स्थलों जैसे मशहूर लेडी ऑफ ताबून पर मिले जीवाश्म इन नयी मानव आबादी का हिस्सा हो सकते हैं. लेडी ऑफ ताबून की खोज 1932 में की गई थी. व्यापक अध्ययन करने पर इस महत्वपूर्ण अजीब मानव ने हमें निएंडथरल शरीर रचना और उनके व्यवहार के बारे में काफी कुछ सिखाया और ऐसे वक्त में जब हमें अपने पूर्वजों के बारे में बहुत कम पता है.

अगर ताबून सी1 और कासिम तथा जूतियेह गुफाओं के अन्य जीवाश्म नेशेर रामला होमो समूह के सदस्य थे तो इस पुन: विश्लेषण में हमें अनुसंधानकर्ताओं द्वारा पूर्व में दिए गए शरीर रचना विज्ञान में कुछ विसंगतियों का पता चलेगा. रहस्यमयी नेशेर रामला होमो निएंडथरल के साथ हमारे हाल के साझा पूर्वज को दर्शा सकते हैं.

दूसरे शब्दों में कहे तो अलग-अलग होमो आबादियों के बीच अंतर प्रजनन अधिक आम था जैसे कि पहले अंदाजा नहीं लगाया गया था. यहां तक कि टीम को नेशेर रामला स्थल पर पत्थर के करीब 6,000 औजार भी मिले. ये औजार उसी तरीके से बनाए गए जैसे कि होमो सैपियंस समूहों ने बनाए थे. इससे यह पता चलता है कि नेशेर रामला होमो और होमो सैपियंस न केवल जीन का आदान-प्रदान करते थे बल्कि औजार बनाने की तकनीक भी साझा करते थे.

और वहां आग थी

इस स्थल पर पकड़े गए, मारे गए और वहां खाए गए पशुओं की हड्डियां भी मिली है. ये खोज दिखाती है कि नेशेर रामला होमो ने कछुओं, हिरन, औरोक्स, सूअर और शुतुरमुर्ग समेत कई प्रजातियां का शिकार किया. साथ ही वे अपना खाना पकाने के लिए आग जलाते थे जो जीवाश्मों के जितने ही वर्षों पुरानी कैम्पफायर की खोज से पता चलता है. निश्चित तौर पर नेशेर रामला होमो कैम्पफायर जलाने और आग बनाने के लिए न केवल लकड़ियां इकट्ठा करते थे बल्कि आग को नियंत्रित भी करते थे जैसा कि आज के लोग करते हैं.

अभी कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है जैसे कि अलग-अलग होमो समूह एक-दूसरे से कैसे बातचीत करते थे? इस अवधि में होमो आबादियों में होने वाले सांस्कृतिक और जीव विज्ञान संबंधी बदलावों के लिए इसका क्या मतलब है. इन सवालों के साथ काम जारी रखने से हमें अपने मानव इतिहास की बेहतर समझ बनाने में मदद मिलेगी.

वो कौन सा ‘बैक्टीरिया’ है, जो करता है हमारे ब्रेन को हेल्दी रखने का काम :

हमारे शरीर की कोशिकाओं में कुछ हिस्से ऐसे हैं जो पहले बैक्टीरिया (Bacteria) से बने थे. इनमें से एक है माइटोकांड्रिया (mitochondria). कोशिकाओं का पॉवर हाउस कहे जाने वाले इस हिस्से की सेहत हमारे मस्तिष्क (Brain)की सेहत बिगाड़ सकती है. बहुत से वैज्ञानिक अब मस्तिष्क की सेहत से माइटोकांड्रिया से संबंध का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं. उन्होंने पाया है कि माइटोकांड्रिया मस्तिष्क की सेहत का कायम रखने में अहम भूमिका निभाता है. यहां तक कि इसका अवसाद से लेकर पार्किंसन्स बीमारी तक दिमाग की लगभग हर बीमारी (Disease) से गहरा संबंध है.

करीब एक अरब साल पहले एक पुरतान बैक्टीरिया (Bacteria) को एक कोशिका (Cell) ने एक तरह से निगल ही लिया था. दोनों मिल कर एक दूसरे की शक्ति बन गए. कोशिका ने जहां इस बैक्टीरिया को नया घर दिया तो बैक्टीरिया अपने नए रूप में कोशिका को शक्ति प्रदान करने वाला केंद्र बन गया. यह नया रूप ही माइटोकांड्रिया (Mitochondria) कहलाता है. माइटोकॉन्ड्रिया की उत्पत्ति बारे में यही सबसे प्रचलित मत है. माइटोकांड्रिया अपने ऐतिहासिक बैक्टीरिया के अवशेष अपने साथ लेकर चलता है जिसका अपना खुद का डीएनए है. 

इस वजह से माइटोकांड्रिया (Mitochondria) कई समस्या का स्रोत भी है. जिस तरह हमारी कोशिकाओं के केंद्रकों (Nuclei of Cells) में डीएनए और मानव जीनोम (Human Genome) मौजूद है, माइटोकांड्रिया का डीएनए में भी म्यूटेशन (DNA Mutation) हो सकते हैं बदलाव हो सकते हैं. उम्र, तनाव, और अन्य कारक उसके कार्यों में बाधा डाल सकते हैं. इसके अलावा माइटोकांड्रिया चोटिल होने पर कई तरह के पदार्थ निकालता है जिन्हें बैक्टीरिया से मिलते जुलते होने के कारण हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी आक्रमणकारी समझ लेती हैं जिससे नुकसान पहुंचाने वाली प्रतिक्रिया शरीर की ही कोशिकाओं को झेलनी पड़ती है.

माइटोकांड्रिया (Mitochondria) को सबसे ज्यादा नुकसान मस्तिष्क (Brain) को हो सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि कोशिका (Cells) में जितने ज्यादा माइटोकांड्रिया होंगे, स्वास्थ्य के लिए उतने ही ज्यादा नुकसानदेह होते हैं. न्यूरॉन यानि मस्तिष्क की हर कोशिका में करीब 20 लाख माइटोकांड्रिया होते हें. ऐसे में वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान मस्तिष्क के लिहाज से माइटोकांड्रिया पर लगाया है. इसमें खास तरह के जेनेटिक पदार्थ होते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि माइटोकांड्रिया के डीएनए एक चक्रीय तंतु बनाता है जिसमें केवल 37 जीन्स होते हैं. जो जीनोम में पाए जाने वाले हजारों की तुलना में काफी कम हैं.

इसके बाद 1970 में यूनिवर्सिटी से डगलस वालेस ने तर्क दिया कि चूंकि माइटोकांड्रिया (Mitochondria) शरीर में ऊर्जा पैदा करने वाला प्राथमिक उत्पादक होते हैं, उनके डीएनए में म्यूटेशन (DNA Mutation) बीमारी दे सकता है. 1988 में यह संबंध पहली बार पता चला जब लेबर्स हेरिडिचरी ऑफ न्यूरोपैथी बीमारी के बारे में पता चला. यह स्थिति अचानक अंधापन ला देती है. तब से वालेस के विचार को गंभीरता से लिया जाने लगा. शोधकर्ताओं ने दर्जनों विकारों का माइटोकांड्रिया के डीएनए में बदलाव से संबंध पाया. वालेस का कहना है कि मस्तिष्क शरीर का केवल 2 प्रतिशत भार है, लेकिन वह शारीरिक ऊर्जा (Body Energy) का पांचवा हिस्सा उपयोग में लाता है. माइटोकांड्रिया के कार्यों में हलकी सी कमी का दिमाग पर गहरा असर होता है.

कई अध्ययनों में पाया गया है कि माइटोकांड्रिया (Mitochondria) के कारण होने वाली बीमारियों (Disorders) में ऑटिज्म जैसी बीमारियां ज्यादा है. 30 से 50 प्रतिशत ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों ने माइटोकांड्रिया विकार दिखाए हैं. जीन के स्तर पर सटीक कारण पता करना एक बहुत ही जटिल कार्य है. ऑटिज्म जैसी बीमारियों में केवल जेनेटिक (Genetic) बदलाव ही कारण नहीं है जिसके जरिए माइटोकांड्रिया योगदान दे सकता है. वायुप्रदूषण जैसे कारक भी माइटोकांड्रिया की सेहत पर असर डाल सकते हैं जिससे ऑटिज्म के मरीज प्रभावित होते हैं. 

इतना ही नहीं साल 2010 में हुए एक शोध में यह भी पाया गया है कि जब माइटोकांड्रिया (Mitochondria) की स्थिति खराब होती है वे ऐसे पदार्थ निकालता है जिसे प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system)बाहरी आक्रमणकारी पदार्थ समझ कर उस पर हमला करती है और कोशिका तक को नुकसान पहुंचाती है. वहीं माइटोकांड्रिया ऐसा कार्य भी करता है जो दिमाग (Brain) की सेहत का कायम रखने के काम आते हैं. और इनमें गड़बड़ होने से दिमाग की सेहत पर सीधा असर होता है.वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि एक दिन माइटोकांड्रिया को आधार बना कर वे बहुत सी बीमरियों का इलाज खोज लेंगे.

ब्रह्माण्ड के विशालतम घूमते पिंड हैं ये अनोखे रेशे :

ब्रह्माण्ड का अध्ययन करते समय हमारे वैज्ञानिक बहुत से सवालों के जवाब खोज रहे हैं. इनमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के अलावा एक सवाल का जवाब जो लंबे समय से हमारे वैज्ञानिक तलाश रहे हैं, वह है- ग्रह और गैलेक्सी घूर्णन (Roatiation) क्यों करते हैं. घूर्णन को लेकर न्यूटन और अन्य वैज्ञानिकों ने भी व्याख्याएं की हैं. लेकिन वे काफी नहीं हैं. अब नए अध्ययन ने सुझाया है कि यह घूर्णन केवल गैलेक्सी (Galaxies) तक ही सीमित नहीं है. संभवतः पूरा ब्रह्माण्ड भी चलायमान अवस्था में हैं. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ब्रह्माण्ड के अब तक सबसे विशालकाय घूमते पिंड के तौर पर उन फिलामेंट या रेशों (Filament of Galaxies) को खोजा है जो विभिन्न गैलेक्सी समूहों को जोड़ते हैं.

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क्या होते हैं ये फिलामेंट से रेशे

गैलेक्सी फिलामेंट को खगोलीय चर्चाओं में केवल फिलामेंट भी कहा जाता है. दो या अधिक गैलेक्सी समूहों को जोड़ने वाले तंतु की तरह काम करते हैं इसीलिए इन्हें यह नाम दिया गया है. लेकिन इन्हें सुपरक्लस्टर कॉमप्लेक्सेस, गैलेक्सी वाल्स और गैलेकसी शीट्स भी कहा जाता है. ये ब्रह्माण्ड के अब तक ज्ञात पिंडों में सबसे विशालकाय पिंड होते हैं.

इस शोध में पता चला

रेशे के आकार के ये पिंड 16 से 26 करोड़ प्रकाशवर्ष की मात्रा की लंबाई लिए होते हैं और उनके ये बहुत विशाल खाली स्थानों की सीमा का निर्माण करते हैं. ये खाली स्थन वॉइड या रिक्तियां कहती हैं. नेचर जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन दर्शाया है कि कैसे ये पिंड ब्रह्माण्ड के लंबे घूर्णन करने वाले पिंड बन गए.

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कैसे बने थे ये रेशे

इससे पहले के अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सुझाया था कि 13.8 अरब साल पहले बिग बैंग के बाद जब ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई थी, ज्ञात पदार्थ की अधिकांश गैस टूट कर विशालकाय चादरों में बदल गई जो टूट कर विशाल खगोलीय जाल के फिलामेंट बन गईं. उस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस बात की संभावना की पड़ताल भी की थी कि गैलेक्सी के रेशे जो लाखों करोड़ों प्रकाशवर्ष लंबे पदार्थ के विशाल बेलनाकार छल्ले (Tendril) होते हैं, खुद भी घूर्णन करते हैं.

हजारों रेशों का अध्ययन

इस अध्ययन के ले वैज्ञानकों के समूह ने हजारों रेशों का एक साथ अध्ययन किया और उनके अक्ष के लंबवत गैलेक्सी के वेग का अवलोकन किया. वैज्ञानिकों ने स्लोआन डिजिटल स्काई सर्वे के आंकड़ों का उपयोग कर 17 हजार से ज्यादा रेशों को अध्ययन किया. वैज्ञानिकों ने उन सभी गैलेक्सी की गति को मापा जो ये हर छल्ले में एक विशाल ट्यूब का निर्माण कर रही थीं

कोणीय आवेग का बनना

अपने विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये छ्ल्ले घूर्णन से तालमेल रखते हुए घुमाने की गतिविधि भी दर्शाते हैं जिससे ये ब्रह्माण्ड के ऐसे विशालतम पिंड हो जाते हैं जिनके पास कोणीय आवेग (Angular Momentum) होता है. रेशे के दो अंतिम बिंदुयों के सबसे निकट के दो तेजोमंडल (Halos) के भार का भी वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया जिससे उनका संकेतों के शक्ति से संबंध पता लगाया जा सके.

हर रेशा नहीं करता घूर्णन

इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि रेशों से निकलने वाले और अंत के स्थान के तेजोमंडल या हालो जितने ज्यादा भारी होते हैं, उतना ही ज्यादा घूर्णन होता है. ये नतीजे बताते हैं कि कोणीय आवेग अप्रयाशित रूप से बहुत ही विशाल पैमाने पर पैदा हो सकता है. वैज्ञानियों ने यह भी पाया कि ब्रह्माण्ड में हर रेशा घूर्णन नहीं करता है, लकिन घूर्णन करने वाले रेशे जरूर मौजूद हैं. यह शोध अब आगे के अध्ययनों को प्रेरित करने वाली साबित होगी जो यह बता सकें ऐसा क्यों होता है और इसमें बिगबैंग की क्या भूमिका है.

ISRO ने छात्रो के लिए आयोजित किया ऑनलाइन कॉम्पटीशन, जानिए किस तरह कर सकते हैं अप्लाई :

ISRO अब जीआईएस टेक्नोलॉजी और अर्थ ऑब्जर्वेशन पर दो नए ऑनलाइन course आयोजित कर रहा कर रहा है है | जिसके लिए इच्छुक छात्र इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग https://www.iirs.gov.in/ की वेबसाइट पर पंजीकरण कर सकते हैं। हाल ही में, संस्थान ने छात्रों के लिए मशीन लर्निंग टू डीप लर्निंग पर एक मुफ्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम भी पेश किया। जहां जीआईएस प्रौद्योगिकी पर इसरो का मुफ्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम 21 जून से 2 जुलाई 2021 तक आयोजित किया जाएगा, वहीं कार्बन चक्र अध्ययन के लिए पृथ्वी अवलोकन पर पाठ्यक्रम 21 जून से 25 जून 2021 तक आयोजित किया जाएगा।

प्रतिभागी आईआईआरएस ई-क्लास पोर्टल के माध्यम से पाठ्यक्रम में भाग ले सकते हैं या विषयों के बारे में जानने के लिए संस्थान के आधिकारिक यूट्यूब चैनल में भी लॉग इन कर सकते हैं। सभी प्रतिभागियों को 70 प्रतिशत उपस्थिति मानदंड के आधार पर पाठ्यक्रमों के लिए इसरो प्रमाणपत्र प्राप्त होगा। आईआईआरएस यूट्यूब चैनल के माध्यम से पाठ्यक्रम सत्र में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को ऑफ़लाइन सत्र के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करनी चाहिए जो 24 घंटे के बाद उपलब्ध कराई जाएगी।

ISRO का कहना है कि यह मुफ्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम सभी के लिए खुला है, और 21 जून से 2 जुलाई 2021 तक निम्नलिखित विषयों को कवर करेगा –

  1. क्लाइंट-सर्वर सिस्टम, इंटरनेट और वेब जीआईएस तकनीक का परिचय।
  2. एचटीएमएल और जावास्क्रिप्ट का परिचय।
  3. SQL क्वेरी और डेटा विज़ुअलाइज़ेशन सहित PostgreSQL और POSTGIS, स्थानिक SQL और भू-विज़ुअलाइज़ेशन QGIS और वेब सहित डेटाबेस प्रबंधन प्रणाली का परिचय।
  4. ओजीसी वी सर्विसेज एंड डेटा पब्लिशिंग जियोसर्वर का उपयोग कर रहा है।
  5. जियोसर्वर SLD, WMS, WFS, WCS और अन्य जियो-वेब सेवाओं पर व्यावहारिक प्रयोग।
  6. वेब मैपिंग API: OpenLayers और USC.
  7. मैशप आर्किटेक्चर का उपयोग कर वेब जीआईएस अनुप्रयोगों का विकास।
  8. शासन के लिए वेब जीआईएस अनुप्रयोग।
  9. कार्बन चक्र अध्ययन के लिए पृथ्वी प्रेक्षण पर इसरो नि:शुल्क ऑनलाइन पाठ्यक्रम का विवरण Details
  10. पाठ्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक पैमाने पर वन और कृषि पारिस्थितिकी प्रणालियों के कार्बन प्रवाह की सटीक मात्रा का ठहराव के लिए पृथ्वी अवलोकन (ईओ) उपग्रहों का उपयोग करने की समझ देना है।

निम्नलिखित विषयों को 21 जून से 25 जून 2021 तक कवर किया जाएगा –

  1. कार्बन चक्र मूल्यांकन में ईओ की भूमिका: स्थिति, चुनौतियाँ और मुद्दे।
  2. पारिस्थितिक तंत्र कार्बन एक्सचेंज को मापना: अवलोकन नेटवर्क, इंस्ट्रुमेंटेशन और उन्नत सेंसर।
  3. कार्बन फ्लक्स का अप-स्केलिंग और मॉडलिंग: रिमोट सेंसिंग और प्रक्रिया-आधारित मॉडलिंग।
  4. पृथ्वी अवलोकन और वनस्पति कार्बन पूल मूल्यांकन में इसकी भूमिका।
  5. मृदा कार्बनिक कार्बन (एसओसी) मूल्यांकन में पृथ्वी अवलोकन और इसकी भूमिका।

इसरो फ्री ऑनलाइन कोर्स के लिए नामांकन कैसे करें

इच्छुक छात्रों को पहले https://www.iirs.gov.in/ वेबसाइट पर पंजीकरण करना होगा।

उनका पूरा नाम उनके कक्षा 10 के प्रमाण पत्र के अनुसार।
ईमेल पता और पासवर्ड।
वे जिस कोर्स में दाखिला लेना चाहते हैं, उसका चयन करना।
व्यक्तिगत विवरण।
शैक्षिक विवरण।
आवश्यक दस्तावेज अपलोड करना।
आवेदक अपने आवेदनों का पूर्वावलोकन भी कर सकते हैं, और जमा करने के बाद आवेदन की स्थिति की जांच कर सकते हैं। जो लोग अधिक जानना चाहते हैं, वे पृथ्वी प्रेक्षण पर ऑनलाइन पाठ्यक्रम के लिए पाठ्यक्रम विवरणिका और अधिक जानकारी के लिए जीआईएस प्रौद्योगिकी पर ऑनलाइन पाठ्यक्रम के पाठ्यक्रम को देख सकते हैं।

सपने में दिख रहे मरे हुए लोग, रहस्‍यमयी बीमारी से इस देश के लोग परेशान :

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस रहस्यमयी बीमारी के मरीज अटलांटिक तट पर बसे कनाडा के न्यू ब्रंसविक (New Brunswick) प्रांत में मिले हैं. इन लोगों को सपने में मरे हुए लोग दिख रहे हैं. जिसके बाद से यहां लोगों के बीच डर पैदा हो गया है. हालांकि इस बीमारी का पता लगाने के लिए कनाडा के कई न्यूरोलॉजिस्ट दिन-रात काम कर रहे हैं. 

वैज्ञानिकों ने बताया क्यों फैल रही बीमारी

इस बीच वैज्ञानिकों ने ये दावा किया है कि यह बीमारी सेलफोन टॉवरों के रेडिएशन (Cellphone Towers Radiation) से फैल रही है. वहीं, कई वैज्ञानिक ऐसे भी हैं जो इस बीमारी के लिए कोरोना वैक्सीन (Corona Vaccine) को दोष दे रहे हैं. हालांकि, उनके इस दावे की कोई भी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है. 

अब तक 6 लोगों की हो चुकी है मौत

वैज्ञानिकों ने बताया कि ये बीमारी कनाडा में आज से करीब 6 साल पहले फैलनी शुरू हुई थी. इसकी चपेट में दर्जनों लोग आ गए थे, जिसमें से 6 की मौत भी हो गई. लेकिन 15 महीने पहले कोरोना वायरस महामारी का कहर शुरू हो गया, जिसके कारण लोगों और स्वास्थ्य अधिकारियों का ध्यान इस बीमारी से हट गया. यही सबसे बड़ी चूक साबित हुआ. 

वैज्ञानिकों के पास नहीं किसी सवाल का जवाब

हालांकि इतना समय बीतने के बाद भी वैज्ञानिकों के पास इस बीमारी का नाम तक नहीं है. लोग लगातार सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यह बीमारी पर्यावरण से फैल रही है? क्या यह अनुवांशिक है? या फिर मछली या हिरण का मांस खाने से फैल रही है? अगर यह सब नहीं है तो क्या है? लेकिन वैज्ञानिक कुछ बता नहीं पा रहे हैं. 

वैज्ञानिकों के पास नहीं किसी सवाल का जवाब

हालांकि इतना समय बीतने के बाद भी वैज्ञानिकों के पास इस बीमारी का नाम तक नहीं है. लोग लगातार सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यह बीमारी पर्यावरण से फैल रही है? क्या यह अनुवांशिक है? या फिर मछली या हिरण का मांस खाने से फैल रही है? अगर यह सब नहीं है तो क्या है? लेकिन वैज्ञानिक कुछ बता नहीं पा रहे हैं. 

जनता को मार्च में दी गई बीमारी की जानकारी

इस रहस्यमयी बीमारी की सार्वजनिक सूचना जनता को मार्च में मिली, जब न्यू ब्रंसविक के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने एक प्रेस रिलीज में इसका जिक्र किया. डॉक्टरों का कहना है कि इसे लेकर धीमी प्रतिक्रिया वैश्विक महामारी के दौरान अन्य चिकित्सा स्थितियों की चुनौती को रेखांकित कर रही है. विज्ञान में असाधारण प्रगति के बावजूद हम अभी भी मानसिक रोग या न्यूरो से जुड़ी बीमारियों की जानकारी में कितने पिछड़े हुए हैं.

40 लाख साल में सबसे अधिक स्तर पर पहुंचा वायुमंडल में CO2 का स्तर :

इस पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के दुष्परिणामों से गुजर रही है. दुनिया भर के पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अब संसार के सभी देशों को तत्काल ही बड़े उठाकर इसकी भरपाई करनी हो. वहीं वैश्विक लॉकडाउन के बाद भी जलवायु समस्याओं में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई है. वायुमंडल में मौजूद कार्बनडाइऑक्साइड के नए स्तरों (CO2 Levels) ने ना केवल आधुनिका काल के रिकॉर्ड को तोड़ा है, बल्कि यह 40 लाख सालों में सबसे ज्यादा स्तर का है.

अमेरिका के नेशनल ओसियानिक एंड एटमॉस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने हाल ही में ऐलान किया है कि मई के महीन में पृथ्वी (Earth) पर कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर (CO2 Levels) 419.13 पार्ट्स पर मिलनियन पाया था जो साल 2021 में का उच्चतम स्तर है. नोआ की ग्लोबल मॉनिटरिंग लैबोरेटरी के वरिष्ठ जलवायु वैज्ञानिक पीटर टैन्स ने बताया कि हम हर साल करीब 40 अरब मैट्रिक टन का कार्बन डाइऑक्साइड का प्रदूषण हर साल वायुमंडल (Atmosphere) में जोड़ रहे हैं. 

टैन्स का कहना है कि अगर हमें जलवायु परिवर्तन (Climate Chagne) के भयावह विनाश को रोकना चाहते हैं तो हमें जल्द से जल्द ही कार्बनडाइऑक्साइड (CO2 Levels) को शून्य स्तर सबसे बड़ी प्राथमिकता के तौर पर करना होगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि 419.13 का यह नया उच्च स्तर पिछले 60 सालों में सबसे ज्यादा मासिक औसत है जबसे सटीक वायुमंडलीय मापन होना शुरू हुए हैं. लेकिन इस नतीजे का सही पैमाना दशकों में नहीं मापा जा सकता है क्योंकि इसके लिए हमें समय के बहुत पीछे जाकर यह जानना होगा पृथ्वी (Earth) आज कार्बन डाइऑक्साइड से कितनी ज्यादा भरी है. 

नोआ का कहना है कि प्लियोसीन युग (Pliocene) के आसपास के समय, करीब 41 से 45 लाख साल पहले कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा (CO2 Levels) आज के प्रदूषित आसमान के बराबर हुआ करती थी. हम ऐसा इसलिए जानते हैं क्योंकि शोधकर्ताओं ने पहले के समय के वायुमडंलीय हालात के कार्बनडाइऑक्साइड के स्तरों की पड़ताल की है. इसके लिए उन्होंने कई जटिल पद्धतियों का उपयोग किया है. पृथ्वी (Earth) के प्लियोसीन युग के अंत समय में हालात बहुत अलग थे और औद्योगिक काल की तुलना में 2 से 3 डिग्री औसत तापमान ज्यादा था. 

प्लियोसीन काल (Pliocene) में पृथ्वी (Earth) के ध्रुवीय इलाके इतने गर्म थे कि वहां जंगल हुआ करते थे और वहां का पानी जो बाद में अंटार्कटिका और आर्क्टिक की बर्फ बना, महासागर का पानी था जिसका जलस्तर आज को जलस्तर से 20 मीटर ऊंचा था. वैज्ञानिकों को आशंका है कि हम इन हालात में वापस पहुंचने से केवल कुछ ही सौ साल दूर हैं. आज के कार्बनडाइऑक्साइड के स्तर (CO2 Levels) के हिसाब से हमारे ग्रह को गर्म करने के लिए पर्याप्त समय है. उससे पहले ही बढ़ता समुद्र जलस्तर करोड़ों लोगों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर देगा. और बचे हुए लोगों को लिए घातक गर्मी को सहन करना संभव ना होगा. 

अगर कार्बनडाइऑक्साइड के स्तर (CO2 Levels) के 419.13 के आंकड़े की तुलना ना की जाए तो शायद यह खतरनाक ना लगे.लेकिन कई वैज्ञानिक इसे अलग ही निगाह से देखते हैं. स्क्रिप्स इंस्टीट्यूट ऑफ ओसियोनोग्राफी के अलग से किए गए मापन नोआ (NOAA) के अंकों की पुष्टि करते हैं जिसमें मामूली अंतर है. इसके अनुसार पिछले साल के 417 की तुलना में इस बार 418.92 का स्तर है. लेकिन कई बार तो स्क्रिप्स का मापा गया दैनिक स्तर 420 पीपीएम तक पहुंच गया था. 

चाहे जो हो, नए नतीजों और अवलोकनों की चेतवानी स्पष्ट है और गलत भी नहीं है. ये केवल कार्बनडाइऑक्साइड के स्तरों (CO2 Levels) को नवीनतम प्रमाण हो सकते हैं लेकिन कहानी वही हो जो पिछले कुछ सालों से हर बार दोहराई जा रही है. जलवायु परिवर्तन (Climate Change) खतरनाक नतीजे देने लगा है और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming), कार्बन उत्सर्जन या कार्बन डाइऑक्साइड या ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन आदि को नियंत्रित करने के लिये हमने कदम नहीं उठाए तो इस शोध की आशंकाएं सच हों हैरानी नहीं होनी चाहिए.

Maldives समेत वो 5 खूबसूरत Islands, जो 21वीं सदी बीतते-बीतते गायब हो जाएंगे :

बीते कुछ सालों में ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर चेताया जा रहा है कि इससे ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलेगी और समुद्र का पानी बढ़ता (sea level has been rising caused by global warming) जाएगा. इससे होगा ये कि समुद्र में बने द्वीपों समेत समुद्र किनारे बसे शहर भी जलमग्न हो जाएंगे. पर्यावरणविद लगातार इस खतरे पर बात कर रहे हैं. खासतौर पर समुद्र के बीचोंबीच खूबसूरत द्वीपों के डूबने को लेकर आगाह किया जा रहा है. कई ऐसे द्वीप हैं, जो अगले 6 दशक से भी कम समय में पानी में समा जाएंगे. 

जलमग्न होने के खतरे में आए द्वीपों से पहले एक बार थोड़ी जानकारी समुद्री जलस्तर और जलवायु परिवर्तन पर जुटाते चलते हैं. सबसे पहले चालीस के शुरुआती दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक बेनो गुटेनबर्ग का ध्यान इसपर गया था. एक स्टडी के दौरान उन्हें संदेह हुआ कि समुद्र में पानी बढ़ रहा है. अपने शक को पक्का करने के लिए गुटेनबर्ग ने बीते 100 सालों के डाटा का अध्ययन किया और उनका शक यकीन में बदल गया. समुद्र का पानी ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से लगातार बढ़ता जा रहा है. नब्बे के दशक में नासा ने भी इसकी पुष्टि कर दी.

इसके बाद से ग्लोबल वॉर्मिंग के दूसरे खतरों पर तो चर्चा हो रही है, साथ ही ये डर भी बढ़ रहा है कि जल्द ही द्वीप जलमग्न होने लगेंगे. ऐसा ही एक द्वीप-समूह है सोलोमन द्वीप (Solomon Islands). दक्षिणी प्रशांत महासागर में लगभग 1000 द्वीपों से मिलकर बना ये समूह तेजी से पानी में डूब रहा है. रीडर्स डायजेस्ट की एक रिपोर्ट इस बारे में बताती है. इसके अनुसार साल 1993 से, यानी जब से इसपर नजर रखने की शुरुआत हुई, द्वीप-समूह के आसपास का पानी हर साल 8 मिलीमीटर ऊपर आ रहा है. पर्यावरण और विज्ञान पत्रिका एनवायरमेंटल रिसर्च लेटर्स के मुताबिक इसके 5 द्वीप डूब चुके हैं.

दक्षिण एशिया के उत्तर में बसे मालदीव का नाम लगभग सभी एशियाई जानते होंगे. सैलानियों के लिए स्वर्ग कहलाने वाला ये द्वीप हिंद महासागर की शान भी कहलाता है. यहां सैर-सपाटे के लिए आए लोगों के लिए शानदार रिजॉर्ट और यहां तक कि पानी के भीतर होटल भी बने हुए हैं. लेकिन वर्ल्ड बैंक समेत कई संस्थाओं को डर है कि आसपास समुद्र का पानी जिस तेजी से बढ़ रहा है, साल 2100 तक ये द्वीप देश पानी में समा सकता है.      

प्रशांत महासागर में स्थित द्वीपीय देश पलाऊ भी समुद्र में डूबने की कगार पर खड़ा द्वीप है. पलाऊ नेशनल वेदर सर्विस ऑफिस और पेसिफिक क्लाइमेट चेंज सर्विस प्रोग्राम ने मिलकर ये नतीजा निकाला. साल 1993 से यहां के समुद्र का पानी हर साल लगभग 0.35 इंच ऊपर आ रहा है. गर्मी इसी तेजी से बढ़ी तो जलस्तर सालाना 24 मीटर की गति से ऊपर आने लगेगा. ये हाल 2090 तक हो सकता है. इसके बाद द्वीप को किसी हाल में बचाया नहीं जा सकेगा.

प्रशांत महासागर में बसा देश माइक्रोनेशिया ऐसा ही एक मुल्क है. हवाई से लगभग 2500 मील की दूरी बस बसा ये द्वीप समूह 607 द्वीपों से मिलकर बना है. इसका केवल 270 वर्ग मील हिस्सा ही जमीन का है, जिसमें पहाड़ और बीच भी शामिल हैं. समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण इसके कई द्वीप तेजी से पानी में समा गए. जबकि कई द्वीपों का आकार लगातार छोटा हो रहा है. जर्नल ऑफ कोस्टल कनजर्वेशन में ये स्टडी आ चुकी. 

फिजी का नाम तो काफी लोग आएदिन सुनते हैं. खूबसूरत बीचों से बने इस द्वीप में बड़ी संख्या में भारतीय भी रहते हैं. दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित ये द्वीप भी हमारे कारण खतरे में है. ध्रुवीय बर्फ पिघलते हुए इसे भी अगले कुछ दशकों में समुद्र के भीतर ले जाएगी. यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज का भी यही कहना है. वर्ल्ड बैंक के अनुसार बीते कुछ ही दशकों में किनारे बसे कई गांवों ने 15-20 मीटर तक डूबने की बात की. 

Oxygen के बगैर भी मुमकिन है जिंदा रहना, इस समुद्री Bacteria ने किया साबित :

एक चौंकाने वाली रिसर्च (research) में एक ऐसे जीव का पता चला है जो ऑक्सीजन के बगैर जी सकता है. सेलमन मछली के भीतर मिले इस परजीवी हेनेगुया सालमिनिकोला की खोज से सदियों से चली आ रही सारी वैज्ञानिक धारणाएं हिल गई हैं और वैज्ञानिक नए सिरे से सोचने लगे हैं कि हो सकता है कि इस बहुकोशिकीय जीव की तर्ज पर आगे चलकर हम सब भी बिना ऑक्सीजन के जिंदा रह सकें.

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (National Academy of Sciences) में छपी इस स्टडी के अनुसार ये समुद्री जीव जैलीफिश की तरह दिखता है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि इसे जीने के लिए सांस लेने की ही जरूरत नहीं पड़ती है. अब ऐसे अनोखे जंतु की खोज के बाद वैज्ञानिक इस दिशा में खोज की तैयारियां करने लगे हैं कि शायद ऑक्सीजन विहीन उन दूसरे ग्रहों पर भी कुछ इसी तरह का जीवन हो जो अब तक हमें दिखाई न दिया हो.

पिछले साल की शुरुआत में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के जरिए वैज्ञानिकों ने बताया कि हेनेगुया सालमिनिकोला (Henneguya salminicola) नाम से जाना जाने वाला ये जीव सेलमन मछली के शरीर में परजीवी की तरह रहता है. 10 कोशिकीय सैलमिनिकोला अपने आप को इस हद तक अनुकूलित कर चुका है कि इसे सांस लेने की जरूरत नहीं होती है. 

इस बारे में इजराइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी (Tel Aviv University) की वैज्ञानिक डोरोथी हचन (Dorothée Huchon) ने बताया कि इवॉल्यूशन यानी क्रमिक विकास इस हद तक भी हो सकता है, इसका खुद वैज्ञानिकों को भी अंदाजा नहीं था.इस खोज से ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि हो सकता है कि आगे चलकर बहुकोशिकीय जीवों को जीने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत खत्म हो जाए.

ये अब तक समझ नहीं आ सका है कि ये परजीवी किस तरह से अपने लिए ऊर्जा पैदा करता है. जैलीफिश की तरह दिखने वाले इस परजीवी की एक और खासियत है कि ये मीठे और खारे दोनों तरह के पानी में रह सकता है यानी ये myxozoan है. लेकिन सेलमन मछली में पाए जाने वाले दूसरे बैक्टीरिया की तरह ये इंसानों के लिए खतरनाक नहीं है. 

इससे पहले तक वैज्ञानिक इसी बात पर यकीन करते रहे थे कि क्रमिक विकास यानी इवॉल्यूशन के दौर में एककोशिकीय जीव धीरे-धीरे बहुकोशिकीय जीवों में बदल जाते हैं और उनकी शारीरिक संरचना ज्यादा जटिल होती जाती है. दूसरी तरफ मछली के शरीर में पाए जाने वाले इस 10 कोशिकीय जीव को देखने पर ये वैज्ञानिक सिद्धांत गलत साबित होता दिख रहा है.

चांद पर बर्फ और अन्य संसाधन खोजने के लिए मोबाइल रोबोट भेजेगा नासा :

नासा (NASA) ने हाल ही में घोषणा की है कि वह साल 2023 के अंत तक चंद्रमा (Moon) पर एक मोबाइल रोबोट भेजेगा. यह रोबोट चंद्रमा की सतह पर बर्फ की उपस्थिति के साथ अन्य संसाधनों की तलाश करने का काम करेगा. इस रोबोट का नाम वोलेटाइल इन्वेस्टीगेटिंग पोलर एक्सप्लोरेशन रोवर यानि VIPER रखा गया है. वाइपर भविष्य में लंबे मानव अभियानों के लिए चंद्रमा की खोजबीन करने में मददगार साबित होगा |

वाइपर (VIPER) अपनी हेडलाइट का उपयोग कर चंद्रमा (Moon) के उन जगहों पर रोशनी करेगा जहां अरबों सालों से सूर्य की रोशनी नहीं पहुंची है और वे ब्रह्माण्ड (Universe) की सबसे ठंडी जगहों में से एक हैं. यह नासा के आर्टिमिस अभियान के लिए काम करेगा जो साल 2024 में लंबे समय के लिए दो लोगों को चंद्रमा की सतह पर उतारेगा. नासा इसे आर्टिमिस अभियान का ही हिस्सा बता रहा है.

नासा (NASA) का कहना है कि वाइपर (VIPER) सौर ऊर्चा पर चलेगा और उसे चंद्रमा (Moon) के दक्षिणी ध्रुव में प्रकाश के चरण उतार चढ़ाव के बीच अपना काम करना होगा. वाइपर को लॉन्च करने, चंद्रमा तक पहुंचाने का काम एस्ट्रोबायोटिक को दिया गया है. वाइपर में विशेष पहिए और सस्पेंशन सिस्टम हो विविध ढालों और मिट्टियों पर अन्वेषण का काम कर सकता है. इससे पहले नासा इसी तरह के रोबोटिक रोवर को डिजाइन कर चुका है जिसे साल 2018 में रद्द किया जा चुका है.

वाइपर (VIPER) अभियान चंद्रमा (Moon) पर तीन दिन, यानि पृथ्वी के सौ दिन के समय तक काम करेगा. नासा (NASA) के वाशिंगटन मुख्यालय में प्लैनेटरी साइंस डिविजन के निदेशक लोरी ग्लैज ने बताया कि वाइपर से मिले आंकड़ों हमारे वैज्ञानिकों को चांद पर बर्फ की सटीक स्थिति और मात्रा की जानकारी दे सकेंगे. इनसे आर्टिमिस यात्रियों के ले दक्षिणी ध्रुव के वातावरण और सक्षम संसाधनों का आंकलन करने में भी मदद मिलेगी.

लोरी ग्लेज ने बताया, “ यह रोबोटिक विज्ञान (Robotic Science) के अभियान और मानव अन्वेषण के साथ साथ चलने की एक और मिसाल है. इससे यह भी पता चलता है कि क्यों चंद्रमा (Moon) पर लंबी उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी के लिए दोनों ही कितनी अहमियत रखते हैं.” काफी समय से अंतरिक्ष अनुसंधान में रोबोट अभियानों की वकालत की बाते हो रही है. लेकिन नासा (NASA) अभी मानव अभियानों को प्राथमिकता तो रहा है, लेकिन वह रोबोट को नजरअंदाज नहीं कर रहा है.

वाइपर के चार प्रमुख उपकरणों का चंद्रमा पर उपयोग होगा. इसमें रोगिलिथ एंड आइस ड्रिल फॉर एक्सप्लोरिंग न्यू टेरेन्स (TRIDENT) हैमर ड्रिल, मास स्पैक्ट्रोमीटर ऑबजर्विंग लूनार ऑपरेशन्स (MSolo) उपकरण, द नियर इंफ्रारेड वोलेटाइल्स स्पैक्ट्रोमीर सिस्टम (NIRVSS) और न्यूट्रॉन स्पैक्ट्रोमीटर सिस्टम (NSS) होंगे. वाइपर अभियान से पहले ये भी उपकरण चंद्रमा की सतह पर जांच लिए जाएंगे.

वाइपर (VIPER) प्रोग्राम की वैज्ञानिक सारा नोबोल का कहना है, “वाइपर नासा (NASA) का अब तक का सबसे सक्षम रोबोट है जो उसने चंद्रमा (Moon) की सतह पर भेजा है. यह चंद्रमा के उन हिस्सों की पड़ताल करेगा जो हमने इससे पहले कभी नहीं देखे हैं. यह रोवल हमें चंद्रमा पर पानी की उत्पत्ति और वितरण के बारे में सिखाएगा कि240 हजार मील दूर पृथ्वी से संसाधनों का उत्खनन कैसे किया जा सकता है. 

छोटे पंछी जैसे डायनासोर में थी उल्लू जैसी विशेषताएं, जीवाश्म ने बताई कहानी :

जीवाश्म विशेषज्ञों को आज के उत्तर चीन और मंगोलिया में एक अनोखा जीवाश्म (Fossil) मिला है. 7 करोड़ साल पुराना यह जीव एक पतला और लंबा डायनासोर (Dinosaur) था जो रेगिस्तान में रहा करता था. इसके शानदार रात में देखने की और सुनने की क्षमता ने इसे छोटा होने के बावजूद रात का शिकारी जीव (nocturnal predator) बना दिया था.

खलिहान उल्लू से समानता

वैज्ञानिकों ने इस जीव को शुवुईया डेजर्टी नाम दिया है. इसके जीवाश्म की हड्डियों के अध्ययन में इस जीव आंख पुतली के पास हड्डियों का छल्ला पाया गया और खोपड़ी में एक हड्डी की नली पाई जो इस डायनासोर के सुनने के अंग के बारे में जानकारी दे रही थी. इस डायनासोर की देखने और सुनने की क्षमताएं अद्भुद हैं जो खलिहान के उल्लू से काफी मिली हैं.

सुनने की क्षमता
इन क्षमताओं से पता चलता है कि यह डायनासोर रात का जीव रहा होगा और उसी समय शिकार करता होगा. इस अध्ययन के नतीजे साइंस जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. इसमें बताया गया है कि शिकारी डायनासोर आमतौर पर औसत से बहुत अच्छी सुनने की क्षमता रखते हैं जो शिकारियों के लिए मददगार गुण है.

शुवुईया का आकार प्रकार

शिकारी डायनासोर में देखने की क्षमता दिन तक ही सीमित हुआ करती थी. लेकिन शुवुईया को रात को बेहतर दिखाई देता था. यह एक तीतर के आकार का दो पैरों वाला क्रिटेशियस काल का डायनासोर है जिसका वजन एक घरेलू बिल्ली के जितना रहा होगा. इसका सर एक पक्षी की तरह है और इसकी खोपड़ी हलकी थी वहीं इसके दांत चावल के दाने जितने छोटे हुआ करते थे.
पंछियों से काफी अलग

शुवुईया की गर्दन मध्यम लंबाई की थी और उसका सिर छोटा था. उसके लंबे पैरों के कारण वह एक अजीब से मुर्गे की तरह दिखाई देता था. वहीं पक्षियों की तरह उसकी भुजाएं लंबी तो नहीं थी लेकिन शक्तिशाली जरूर थीं जिसके अंत में एक लंबा पंजा होता था जो खुदाई के लिए बहुत उपयोगी होता था.

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कैसे करता था शिकार

इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और दक्षिण अफ्रिका में विटवाटर्सरैंड यूनिवर्सिटी के जीवाश्मविज्ञानी जोना श्वेनियर ने बताया कि रेगिस्तान में रहने वाला यह प्राणी रात को विचरण करता था. अपनी सुनने और और रात को देखने वाली शानदार क्षमताओं के जरिए वह अपने शिकार कि स्थिति का सटीक अंदाजा लगा लेता था जैसा कि कुछ रात के शिकारी स्तनपायी जीव, कीड़े, छिपकली आदि करते हैं. अपने लंबे पैरों से वह तेजी से दौड़कर शिकार पर झपट सकता था.
दूसरे जानवरों के गुण

इस जीवाश्म ने लंबे समय तक जीवाश्मविज्ञानियों को हैरान किया हुआ था. वहीं खलिहान उल्लू भी एक रात का शिकारी जीव है. जिसकी शारीरिक संरचना शुवुईया से काफी मिलती जुलती दिखाई दी और दोनों का आकार भी एक सा ही है. शोधकर्ताओं ने पाया कि उसकी आंखों के पास की हड्डियों बताती है ये वैसी ही आंखे थीं जैसी पक्षियों और छिपकली में पाई जाती हैं.

चमगादड़ में पैदायशी होती है ध्वनि की गति की समझ- शोध ने किया खुलासा

आमतौर पर डायनासोर रात के जीव नहीं होते हैं. लेकिन इनमें एक अल्वारेजसोर का समूह होता है जिसमें शुवुईया शामिल है. अल्वारेजसोर की पूरी वंशावली में रात के जीव हैं. लेकिन सुनने की क्षमता इनमें देर से विकसित हुई. शोधकर्ताओं का मानना है कि बहुत से जीव शिकार से बचने के लिए रात को निकलने लगे थे जिसके बाद अल्वारेजसोर जैसे समूह का विकास हुआ.