कंगना राणावत लाइफ़ स्टोरी – Biography of Kangana Ranaut

Introduction

कंगना रनौत एक भारतीय फिल्‍म अभिनेत्री हैं। जिन्‍होंने अपने दम पर बॉलीवुड में अपने आप को स्‍थापित किया है। उन्‍हें तीन बार राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार और चार बार फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार भी मिल चुका है। वे भारत की अग्रणी अभिनेत्रियों में से एक हैं। कंगना को भारतीय सिनेमा में सबसे ज्‍यादा फीस पाने वाली अभिनेत्री के तौर पर पहचाना जाता है। कंगना रनौत को पांच बार फोर्ब्स इंडिया की टॉप 100 सेलीब्रिटीज की लिस्‍ट में जगह मिल चुकी है। साल 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘क्वीन’ में उनके ज़बरदस्त एक्टिंग के लिए उन्हें बॉलीवुड की क्वीन भी कहा जाने लगा।

कंगना राणावत प्रारंभिक जीवन

कंगना राणावत का जन्म 23 मार्च 1986 को हिमाचल प्रदेश के मंदी जिले के भाम्बला ग्राम में एक राजपूत परिवार में हुआ था। उनकी माता आशा रनौत एक स्कूल टीचर और पिता अमरदीप राणावत एक व्यापारी थे। उनकी एक बड़ी बहन, रंगोली 2014 से कंगना की मेनेजर है और उनका छोटा भाई, अक्षत है। उनके परदादा सरजू सिंह रनौत, लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य थे और उनके दादाजी इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन सर्विस के अधिकारी थे। भाम्बला की प्राचीन हवेली में ही उनका पालन पोषण हुआ है और अपने बचपन की जिंदगी को राणावत “साधारण और खुश” बताती है। राणावत के अनुसार जब वह बड़ी हो रही थी तब वह “जिद्दी और विद्रोही” थी। उनके अनुसार यदि मेरे पिताजी मेरे भाई के लिये प्लास्टिक गन लाते थे और मेरे लिये एक छोटी गुडिया लाते थे, तो मै उसे कभी भी अपनाती नही थी। बल्कि मै इस भेदभाव का प्रश्न पूछती थी।

कंगना राणावत की शिक्षा

चंडीगढ़ की DAV स्कूल से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और वही उन्होंने अपना मुख्य विषय विज्ञान को बनाया और उसी विषय में उनको काफी रूचि भी थी। पहले वह अपने माता-पिता की इच्छा के अनुसार डॉक्टर बनना चाहती थी।लेकिन 12 वी में वह केमिस्ट्री की यूनिट टेस्ट में फेल हो गयी और तभी से रनौत ने ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट देने की बजाये अपने करियर को पुनः निर्धारित करने की ठानी। इसके बाद कुछ समय के लिये वह 16 साल की उम्र में ही दिल्ली आ गयी। उस समय वह मेडिकल के क्षेत्र में नही जाना चाहती थी। दिल्ली में, राणावत को कुछ पता नही था की वह कौनसे क्षेत्र में अपना करियर बनाये, लेकिन अचानक ही एक मॉडलिंग एजेंसी उनके अंदाज़ और लुक्स से काफी प्रभावित हो गयी। इसके बाद उन्होंने कुछ मॉडलिंग असाइनमेंट किये लेकिन उन्हें इस क्षेत्र में ज्यादा रूचि नही थी क्योकि उन्हें ऐसा लगता था की इस क्षेत्र में क्रिएटिविटी के लिये कोई खास जगह नही है। इसीलिए इसके बाद राणावत ने एक्टिंग पर ध्यान देने की ठानी और अस्मिता थिएटर ग्रुप में शामिल हो गयी, जहा डायरेक्टर अरविन्द गौर ने उन्हें प्रशिक्षित किया था। इसके बाद उन्होंने गौर के थिएटर वर्कशॉप में भी भाग लिया था और बहुत से नाटको में भी उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया था। एक प्रदर्शन के समय जब मेल एक्टर गायब था, तब रनौत ने अपने रोल के साथ-साथ उस एक्टर का रोल भी निभाया था। जिसके लिये दर्शको से भी उन्हें सकारात्मक प्रतिसाद मिला था। बाद मे वह एक्टिंग में ही अपना करियर बनाने के लिये मुंबई आ गयी और उन्होंने सबसे पहले खुद को आशा चंद्रा की ड्रामा स्कूल में चार महीने के एक्टिंग कोर्स के लिये दाखिल करवाया। कहा जाता है की फिल्म इंडस्ट्री में रनौत के प्रारंभिक वर्ष मुश्किलों से भरे पड़े थे। वह जानती थी की इंग्लिश भाषा का उन्हें उतना ज्ञान नही है और उन्हें एक्ट्रेस बनने के लिये भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। 2013 में डेली न्यूज़ को दिये गए इंटरव्यू में रनौत ने कहा था की :“इस इंडस्ट्री के लोग चाहते है की मुझे बोलने का कोई हक़ नही है और मै किसी की अन चाही चीज हूँ। मै जानती हूँ की मै अच्छी तरह से इंग्लिश नही बोल पाती और इसीलिए लोग मेरा मजाक भी उड़ाते है। इसीलिए अस्वीकार के साथ डील करना मेरी जिंदगी का अब एक अहम हिस्सा बन चूका है…..। मैंने जाना है की तारीफों से मेरा संबंध होना काफी मुश्किल है। आज जब मुझे देखकर लोग कहते है की मैंने कुछ तो हासिल किया है और मैंने अपने बलबूते पर कुछ तो अलग किया है, तब मुझे ऐसा लगता है की मैंने अपनेआप को कही बांधकर रखा है। ये सारी बाते मुझे डराती है। ”संघर्ष के दिनों में राणावत को एक्टर आदित्य पंचोली और उनकी पत्नी ज़रीना वहाब का साथ मिला था और कंगना उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह ही मानती थी। लेकिन मीडिया ने कुछ समय बाद पंचोली और कंगना के प्यार की अफवाहे लोगो के बीच फैलाई थी। लेकिन कंगना ने इस विषय पर बोलने से मना कर दिया था। कहा जाता है की 2007 में कंगना ने आदित्य पंचोली के खिलाफ शारीरिक जबरदस्ती करने की कंप्लेंट पुलिस में दर्ज करवायी थी। इस घटना के कारण कुछ समय तक कंगना मीडिया में छाई हुई थी। कुछ समय बाद उनके रिश्तेदार भी उनके द्वारा चुने गए करियर से नाराज़ थे और इसीलिए आने वाले कुछ वर्षो तक कंगना को अपने परिवार का साथ भी नही मिला था। लेकिन 2007 में कंगना की फिल्म लाइफ इन ए…मेट्रो रिलीज़ होने के बाद कंगना को फिर से अपने परिवार का साथ मिलने लगा था।

कंगना राणावत फ़िल्मी कैरिअर

कंगना राणावत ने 2006 में आयी थ्रिलर फिल्म “गैंगस्टर” से डेब्यू किया था। जिसके लिये उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट फीमेल डेब्यू अवार्ड भी मिला था। इसके बाद 2006 में आयी फिल्म “वोह लम्हे” में उन्होंने एक भावुक किरदार की भूमिका निभाई, इसके बाद “लाइफ इन….मेट्रो” (2007) और “फैशन” (2008) जैसी उन्होंने बहुत सी सुपरहिट फिल्मे की है। इसके लिये उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का राष्ट्रिय अवार्ड और इसी श्रेणी में उन्हें एक फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला है। इसके बाद कंगना ने कमर्शियल सफल फिल्म “राज़: दी मिस्ट्री कंटिन्यू” (2009) और अजय देवगण के साथ “वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई” (2010) की। इसके बाद उन्होंने 2011 में बॉक्स ऑफिस हिट फिल्म “तनु वेड्स मनु” में आर. माधवन के साथ एक कॉमिक रोल निभाया। बाद में उन्होंने हृतिक रोशन की साइंस फिक्शन फिल्म क्रिश 3 (2013) में एक उत्परिवर्ती जंतु का किरदार निभाया था। जो बॉलीवुड की सबसे सफलतम फिल्म में से एक है। 2014 में आयी फिल्म क्वीन में उनके प्रदर्शन के लिये उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर और नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिला। 2015 में रनौत ने “तनु वेड्स मनु रिटर्न्स” में ड्यूल रोल निभाया, जो किसी भी महिला की सबसे सफलतम बॉलीवुड फिल्म रही, इसके लिये उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड और बेस्ट एक्ट्रेस का लगातार दूसरा फिल्मफेयर और नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिला।

कंगना राणावत को मिले हुए अवार्ड्स

राणावत तीन नेशनल फिल्म अवार्ड की हक़दार रह चुकी है: फैशन (2008) के लिये बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और क्वीन (2014) के लिये बेस्ट एक्ट्रेस और तनु वेड्स मनु रिटर्न्स (2015) के लिये भी बेस्ट एक्टर का अवार्ड उन्हें मिला था। इसके साथ ही वे चार फिल्मफेयर अवार्ड भी जीत चुकी है: गैंगस्टर (2006) के लिये बेस्ट फीमेल डेब्यू अवार्ड, फैशन (2008) के लिये बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवार्ड, क्वीन (2014) के लिये बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड और तनु वेड्स मनु रिटर्न्स (2015) के लिये बेस्ट एक्ट्रेस (क्रिटिक्स) अवार्ड।

महेंद्र सिंह धोनी के जीवन के बारे में – Biography of MS Dhoni

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके महेंद्र सिंह धोनी से आप जिंदगी में आगे बढ़ने के तमाम सबक सीख सकते हैं। क्रिकेट मैच की कठिन परिस्थियों में भी धोनी का शांत और ठंडे दिमाग के साथ डटे रहने की कला ने उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम का सबसे सफल कप्तान बनाया। हाल ही में धौनी ने श्रीलंका के खिलाफ खेली गई एक सीरीज के दूसरे वनडे मैच में भारत को जीत दिलाई। मैच भारतीय टीम के हाथ से निकल गया था लेकिन धोनी की सूझबूझ भरी पारी ने उस मैच को श्रीलंका से वापस भारत के खेमे की तरफ ढकेल दिया। मैच में भूवनेश्वर कुमार ने भी अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि वह भी अपने प्रदर्शन के पीछे धोनी का ही हाथ मानते हैं। धोनी की तरह आप भी अपने जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों का सामना डटकर कर सकते हैं बस आपमें धैर्य होना चाहिए। आइए जानते हैं महेंद्र सिंह धोनी के जीवन के बारे में जहां वो एक साधारण गोलकीपर से सफलतम क्रिकेट कप्तान बनें।

बचपन

महेंद्र सिंह धोनी का जन्म 7 जुलाई 1981 को रांची, झारखंड में हुआ था। इन्होंने अपनी पढ़ाई डीएवी जवाहर विद्या मंदिर से पूरी की तथा धोनी को फुटबॉल और बैडमिंटन में बेहद दिलचस्पी थी। एम.एस धोनी का परिवार काफी आम था। उनके पिता पान सिंह, मेकॉन कंपनी के लिए काम किया करते थे तथा मां देवकी देवी एक गृहिणी हैं। उनके बड़े भाई, नरेंद्र सिंह धोनी एक राजनीतिज्ञ हैं और बहन जयंती गुप्ता, अध्यापिका हैं। एम.एस धोनी अपनी फुटबॉल टीम के गोलकीपर थे और जिला तथा राज्य स्तर पर खेलने के लिए सक्षम थे। लेकिन अपने फुटबॉल कोच के आग्रह पर उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया।

वनडे के कप्तान बने

2007 में धोनी एकदिवसीय टीम के कप्तान बने और 2008 में टेस्ट टीम के कप्तान बनाए गए। 2009 में, उन्होंने 24 पारियों में 1198 रन बनाए थे, यह 70.43 का औसतन स्कोर ओडीआई मैच में साल का सर्वश्रेष्ठ स्कोर था।

सबसे ज्यादा कमाई

वर्ष 2008 से 2013 तक धोनी लगातार 6 वर्षों के लिए आईसीसी विश्व एकदिवसीय XI का हिस्सा रहे। 2008 में धोनी को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च खेल पुरस्कार है। धोनी ने 2013 तक 15 से भी अधिक उत्पादों का विज्ञापन किया और वे दुनिया के सबसे अधिक विपणन योग्य खिलाड़ियों में से एक हैं। जून 2013 में, वे दुनिया के 16वें सबसे ज्यादा कमाई करने वाले खिलाड़ी बने और उस समय इनकी सालाना कमाई $31 मिलियन डॉलर थी।

सफल कप्तान

धोनी विश्व के सबसे सफल खिलाड़ियों में से एक हैं और भारत के सबसे सफल कप्तानों में से भी एक हैं। कप्तान के रूप में धोनी ने भारत को 60 टेस्ट मैचों में से 27 टेस्ट मैचों में जीत दिलाई और 194 वनडे में से 107 में जीत हासिल कराई। इन्होंने 70 टी20 मैचों की कप्तानी की और उनमें से 40 में जीत दर्ज की। 4 जनवरी 2017 को, इंग्लैंड के खिलाफ एकदिवसीय और टी20 मैचों को खलने से पहले धोनी ने कप्तानी से सन्यास ले लिया। हालांकि वे अभी भी टीम में विकेटकीपर और बल्लेबाज के रूप में मौजूद हैं।

युवाओं को दिया मौका

उन्होंने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि वे युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौका दे सके। वह निश्चित रूप से खेल के इतिहास में सबसे सफल भारतीय कप्तानों के रूप में याद किए जाएंगे। धोनी की कामयाबियां धोनी ने अपने शानदार करियर में कई पडावों को पार किया। चलिए जानते हैं धोनी की सफलताओं के बारे में 2007 में धोनी को आईसीसी टी20 विश्व कप के लिए भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बनाया गया। इस मैच में वे ट्रॉफी के साथ दक्षिण अफ्रीका से लौटे।

वनडे और टेस्ट की कप्तानी

बाद में वनडे मैचों के लिए भारतीय क्रिकेट टीम का स्थायी कप्तान बनाया गया। जिसके अगले ही साल वे टेस्ट टीम के कप्तान भी बन गए, क्योंकि अनिल कुंबले घायल थे जोकि तब की टीम के उप-कप्तान थे। उस सीरीज़ के बाद कुंबले ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और धोनी भारत के पूर्णकालिक टेस्ट कप्तान बन गए। धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम आईसीसी टेस्ट रेटिंग्स में पहले स्थान पर पहुंच गई।

जीत का नाम धोनी

2009 में श्रीलंका के खिलाफ बनाया गया 726/9 का स्कोर सबसे अधिकत्म टेस्ट स्कोर था। 2011 में आईसीसी क्रिकेट विश्व कप जीत कर, धोनी कपिल देव के बाद विश्व कप जीतने वाले दूसरे भारतीय कप्तान बने। वे टी-20 और वनडे जैसे दो आईसीसी विश्व कप को जीतने वाले एक मात्र कप्तान हैं।

कमाल के विकेट कीपर

17 जनवरी 2008 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली गई पारी में पांच विकेट लेकर, धोनी ऐसा करने वाले पहले भारतीय विकेटकीपर बने, इस तरह का पहला रिकॉर्ड एडम गिलक्रिस्ट ने बनाया था।

लारा का रिकॉर्ड तोड़ा

धोनी बल्लेबाजी में भी काफी अच्छे थे। वनडे की दूसरी पारी में धोनी ने 183 रन बनाएं जोकि अब तक का अधिकतम स्कोर है (उन्होंने ब्रायन लारा का 153 रनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया)।

धुंआधार पारी

183 रनों की पारी में धोनी ने 10 छक्के और 15 चौके लगाकर 120 रहने बनाए। यह अब तक की पारी में किसी भी भारतीय द्वारा मारे गए सबसे अधिकतम छक्के और चौके हैं। इस रिकॉर्ड ने धोनी को आईसीसी और एकदिवसीय बल्लेबाजी रैंकिंग में पहले स्थान पर पहुंचा दिया। 2014-15 में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने की घोषणा की।

आखिरी टेस्ट में भी किया कारनामा

अपने आखिरी टेस्ट मैचों में धोनी ने कुमार संगकारा के स्टंपिंग (134) का रिकॉर्ड तोड़ा, और वे अधिकतम विकेट लेने वाले पहले भारतीय बने।

सचिन का रिकॉर्ड तोड़ा

कप्तान के रूप में धोनी ने टेस्ट मैच में 224 का अधिकतम स्कोर बनाया जबकि सचिन तेंदुलकर का अधिकतम स्कोर 217 है। धोनी सबसे सफल भारतीय टेस्ट कप्तान हैं, इन्होंने 24 टेस्ट जीते हैं।

दिग्गजों के साथ लिया जाता है धोनी का नाम

वे दुनिया के तीनों कप्तानों में से एक है, जिन्होंने 300 से अधिक एकदिवसीय मैचों में टीम का नेतृत्व किया है। फिलहाल वे रिकी पोंटिंग और स्टीफन फ्लेमिंग के बाद तीसरे स्थान पर हैं। रिकी पॉटिंग और एलन बॉर्डर के बाद 100 वनडे मैच जीतने वाले वे तीसरे कप्तान हैं।

धोनी की धूम

कुछ ही कप्तान लंबे समय के लिए अपनी टीम में विकेटकीपर के तौर पर बने रहे। इस सूची में गैरी अलेक्जेंडर को पछाड़ कर धोनी पहले स्थान पर हैं। इन उपलब्धियों के अलावा धोनी टेस्ट मैचों में अधिकतम स्कोरिंग बनाने वाले विकेटकीपर कप्तान हैं। विकेटकीपर के रूप में, इन्होंने सिर्फ 114 पारियों में अपना ‘डबल’ (4000 रन, 100 विकेट) पूरा किया। ऐसा करने वाले वे दुनिया के छठे और सबसे कम उम्र वाले खिलाड़ी हैं।

विकेटकीपर बॉलर धोनी

वह दुनिया में एकमात्र विकेटकीपर हैं जिन्होंने विकेट लिया। सिर्फ एक बल्लेबाज और एक विकेटकीपर के तौर पर ही नहीं, बल्कि हमारे कप्तान ने खुद को एक गेंदबाज के रूप में साबित किया है। इन्होंने वेस्टइंडीज के ट्रैविस डोलिन का विकेट लिया था।

IPL में भी धोनी का जलवा

2008 में खेला गया इंडियन प्रीमियर लीग में धोनी चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान बने। पिछले छह सालों में उसने ट्रॉफी को दो बार जीता। ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाले वे एकमात्र कप्तान हैं। 2016 आईपीएल में धोनी राइजिंग पुणे सुपरगर्नेट्स के कप्तान बनाए गए।

पर्सनल लाइफ

2010 में, माही ने अपनी बचपन की प्रेमिका, साक्षी से शादी की। धोनी और साक्षी श्यामाली के डीएवी जवाहर विद्या मंदिर में एक साथ पढा करते थे। बाद में साक्षी, कोलकाता से होटल मैनेजमेंट की पढाई पूरी करके द ताज बंगाल में एक प्रशिक्षु के रूप में काम करने लगी। इन दोनों के परिवारों में भी काफी अच्छी मित्रता थी। साक्षी का परिवार देहरादून, उत्तराखंड से है और पिता के सेवानिवृत्त होने के बाद उनका परिवार वापस देहरादून चला गया।

धोनी के जीवन पर बनी फिल्म

चट मंगनी पट ब्याह होने के कारण धोनी के दोस्तों ने पत्रकारों को बताया कि शादी की सारी तैयारी योजनाबद्ध तरीके से की गई। धोनी के दोस्तों की सूची में प्रसिद्ध मॉडल और अभिनेत्री बिपाशा बसु भी शामिल हैं। फरवरी 2015 को साक्षी को एक बेटी पैदा हुई, जिसका नाम ज़ीवा रखा गया। एम.एस धोनी: द अनटॉल्ड स्टोरी, महेंद्र सिंह धोनी के जीवन पर आधारित फिल्म है। इस फिल्म को नीरज पांडे ने निर्देशित किया। फॉक्स स्टार स्टूडियो ने फराइडे फिल्म वर्क्स, इंस्पायर्ड एंटर्टेनमंट और अरुण पांडे के साथ मिलकर फिल्म को बनाया तथा अकेले फिल्म का वितरण किया। फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत ने धोनी का किरदार निभाया और दिशा पटानी, कीरा आडवाणी और अनुपम खेर सहायक भूमिका में नज़र आए।

Biography of Ranveer Singh

रणवीर सिंह

6 जुलाई 1985, मुबई

परिचय

एक भारतीय अभिनेता है। मुबई में जन्मे सिंह हमेशा से ही अभिनेता बनना चाहते थे परन्तु कॉलेज के दिनों में उन्हें लगा की अभिनय का ख्याल काफ़ी दूर की बात है और उन्होंने लेखन की ओर लक्ष्य केंद्रित किया। इंडियाना युनिवर्सिटी, ब्लूमिंगटन से बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री करते वक्त सिंह पुनः अभिनय की ओर आकर्षित हुए और वापस भारत में आने के बाद उन्होंने मुख्य किरदारों के लिए हिन्दी फ़िल्म उद्योग में ऑडिशन देने शुरू किए।

2010 में सिंह ने यश राज फिल्म्स की नई फ़िल्म बैंड बाजा बारात के लिए ऑडिशन दिया और भूमिका प्राप्त करने में सफल रहे। यह रोमांस कॉमेडी शादियों के योजनाकारों पर आधारित थी और रणवीर को एक पारंपरिक दिल्ली के लड़के, बिट्टू, का किरदार निभाना था। फ़िल्म के निर्देशक मनीष शर्मा ने उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैम्पस में भोजन अवकाश के दौरान भेजा जहा से उन्हें अपने किरदार के लिए प्रेरणा मिली। रिलीज़ के बाद बैंड बाजा बारात व्यपतिक और समीक्षा की दृष्टी से हिट फ़िल्म साबित हुई और रणवीर को अपनी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ नए पुरुष अभिनेता के फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

रणवीर सिंह बचपन से ही एक्टर बनना चाहते थे, इसके लिये वे स्कूल में आयोजित बहुत से नाटको और बहुत सी वक्तृत्व स्पर्धाओ में भी हिस्सा लेते थे। फिर एच.आर. कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स, मुंबई में दाखिल होने के बाद रणवीर सिंह को अनुभव हुआ की फिल्मो में काम करना इतना भी आसान काम नही है, क्योकि उन्हें बहुत से लोगो ने यही बताया था की जिनका पारिवारिक इतिहास फिल्मो से जुड़ा हुआ होता है वही फिल्म क्षेत्र में आगे बढ़ सकते है। लेकिन जब रणवीर सिंह को इस बात का अनुभव हुआ की वे एक्टिंग नहीं कर पाएंगे तो उन्होंने प्रभावशाली लेखन पर ज्यादा ध्यान दिया। यूनाइटेड स्टेट की इंडिआना यूनिवर्सिटी से उन्होंने बैचलर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री हासिल की है। यूनिवर्सिटी में, उन्होंने एक्टिंग का प्रशिक्षण भी लिया था और किशोरावस्था में ही वे थिएटर में जाने लगे थे। पढाई पूरी करने के बाद 2007 में मुंबई वापिस आ गए। इसके बाद सिंह कुछ सालो तक ओ एम और जे. वाल्टर थोपसन जैसी एजेंसी के लिये एडवरटाईजमेंट करने लगे थे। इसके बाद उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर का काम किया था, लेकिन फिर एक्टिंग में कैरियर बनाने के लिये उन्होंने इस काम को भी छोड़ दिया था। इसके बाद वे एक्टिंग के लिये होने वाले सभी ऑडिशन में जाने लगे थे लेकिन उन सभी में उन्हें सफलता नही मिल सकी। ऑडिशन के बाद उन्हें फिल्मो में केवल छोटे-छोटे रोल ही मिलने लगे थे।

फिल्मी कॅरियर :रणवीर सिंह का फिल्मी कॅरियर की सुरुआत निर्देशक मनीष शर्मा की फिल्म ‘ बैंड बाजा बारात ‘ से की, यह फिल्म रोमांस कॉमेडी शादियों के योजनाकारों पर आधारित थी और रणवीर को एक पारंपरिक दिल्ली के लड़के, बिट्टू, का किरदार निभाना था। जिसे उन्होने बखूबी निभाया, और फिल्म सूपर हिट कर गयी। और रणवीर सिंह को अपनी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ नए पुरुष अभिनेता के फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्होने कई फ़िल्मो मे काम किया, 2015 मे रिलीज़ हुवी रणवीर सिंह की सूपर हिट फिल्म बाजी राव मस्तानी के लिए उन्हे बेस्ट एक्टर का फ़िल्मफेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया। वैसे रणवीर सिंह फ़िल्मो के अलावा सामाजिक कामो मे भी आगे रहते है।

रणवीर के अनुसार उनकी दादी अमिताभ बच्चन की बहुत बड़ी फैन थी और उन्होंने उन्हें हमेशा उनके जैसे बनने की प्रेरणा दी थी इसलिए अगर आज मैं हीरो हूँ तो तमाम उन छोटी बड़ी बातों के साथ दादी की बातों से भी मैंने प्रेरणा ली है उन्होंने हमेशा मुझे प्रेरणा दी है। रणवीर सिंह उन गिने चुने लोगो में से भी है जो सेलेब्रिटी होने के बाद भी अपने विचारो और सामाजिक विषयों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते है रणवीर सिंह से जब उनके सेक्स लाइफ के बारे मे पूछा गया तो उन्होंने अपने विचार काफी सहज तौर पर इस तरह रखे “ कि वो अपनी सेक्स लाइफ को बेहद अलग तरह से लेते है और वह काफी एक्टिव है क्योंकि मैं सेक्स के बिना नहीं रह सकता हूँ।” अवार्ड और नामनिर्देशन –सिंह को अब तक 2 फिल्मफेयर अवार्ड मिल चुके है, जिनमे बैंड बाजा बारात (2010) के लिये बेस्ट मेल डेब्यू अवार्ड और प्रियंका चोपड़ा और दिपिका पादुकोण के साथ आयी फ़िल्म बाजीराव मस्तानी (2016) के लिये बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था। इसके साथ-साथ 2013 में आयी फिल्म गोलियों की रासलीला राम-लीला के लिये उनका नामनिर्देशन बेस्ट एक्टर की सूचि में भी किया गया था।

तो यह है फिल्मो के बाजीराव की असल कहानी जो बॉलीवुड में उनके संघर्ष को बयाँ करती है। और बताती है की अगर इंसान के अंदर कुछ कर गुजरने की इच्छा हो तो जाहिर तौर पर हर इंसान अपने सपनो की पूरा करने की काबिलियत रखता है। हम सभी रणवीर सिंह के इस हौसले को सलाम करते है।

Biography of Dipika Padukon

5 जनवरी 1986, डेनमार्क

दीपिका पादुकोण

परिचय

दीपिका पादुकोण हिन्दी फिल्म अभिनेत्री और मॉडल हैं। दीपिका ने अपनी मेहनत और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई है और वे भारतीय सेलिब्रिटीज में सबसे चर्चित और आर्कषक सेलिब्रिटी हैं। वे किशोरावस्थार में राष्ट्रीय स्तर की बैंडमिंटन खिलाड़ी रहीं हैं लेकिन फैशन मॉडल बनने के लिए उन्हों ने खेल में अपना करियर नहीं बनाया और वे फिल्मों में आ गईं। उन्हेंने आलोचकों के साथ साथ जनता का भी खूब प्यायर मिला है और इसी के बदौलत उनका नाम आज की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार है। आज उनके प्रशंसकों की संख्या लाखों करोड़ों में है।

पृष्ठतभूमि

दीपिका का जन्म कोपेनहेगन, डेनमार्क में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रकाश पादुकोण है जो कि मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं। उनकी मां का नाम उज्जवला है। उनकी एक छोटी बहन भी हैं जिनका नाम अनीशा है। दीपिका पादुकोण की शादी बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह से 14 नवंबर 2018 को सम्पन्न हुई।

पढ़ाई

दीपिका की शुरूआती पढ़ाई बैंगलोर के सोफिया हाईस्कूल से हुई है। इसके बाद की पढ़ाई उन्होंएने माउंट कैरमल कॉलेज से पूरी की। समाजशास्त्र में बी.ए. की डिग्री के लिए उनका दाखिला इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी में हुआ था लेकिन मॉडलिंग में करियर बनाने के चलते उन्हों ने इसे छोड़ दिया।

करियर

दीपिका के हिन्दी फिल्मी करियर की शुरूआत‍ ब्लाआक बस्टर फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से हुई थी जिसमें उनके हीरो सुपरस्टार शाहरूख खान थे। इस फिल्म ने बॉक्स्आफिस पर कमाल किया और फिल्म सुपरहिट हो गई। भारत के साथ साथ विदेशों में भी यह फिल्मर काफी पसंद की गई और यहीं से दीपिका की गाड़ी चल निकली। इस फिल्मे के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठग नवोदित अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्काकर भी मिला। हालांकि इसके बाद उनको कई फिल्मों में असफलता का भी सामना करना पड़ा लेकिन दीपिका ने कभी हार नहीं मानी | फिल्म ‘कॉकटेल’ उनके जीवन का टर्निंग प्वाीइंट रही। इस फिल्म में उनके अभिनय की काफी प्रशंसा हुई और आलोचकों और जनता, दोनों का उन्हेंप प्यार मिला। वह अब तक कई सुपरहिट फिल्में दर्शकों को दे चुकी हैं जिनमें से रेस 2, चेन्ई् एक्सप्रेस, गोलियों की रासलीला रामलीला, बाजीराव मस्तानी और पद्मावत आदि प्रमुख हैं।

Biography of Akshay Kumar


9 सितम्बर, 1967 दिल्ली


90 के दशक में, हिट एक्शन फिल्मों जैसे खिलाड़ी (1992), मोहरा (1995) और सबसे बड़ा खिलाड़ी (1995) में अभिनय करने के कारण, कुमार को बॉलीवुड का एक्शन हीरो की संज्ञा दी जाती थी और विशेषतः वे खिलाड़ी श्रृंखला के लिए जाने जाते थे। फिर भी, वह रोमांटिक फिल्मों जैसे ये दिल्लगी (1995) और धड़कन (2000) में अपने अभिनय के लिए सम्मानित किए गए और साथ ही साथ ड्रामेटिक फिल्मों जैसे एक रिश्ता (2001) में अपनी अभिनय क्षमता को दिखाया। 2002 में उन्हें अपना पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ खलनायक फ़िल्म अजनबी (2001) में अभिनय के लिए दिया ग
या। अपनी एक सी छवि को बदलने के इच्छुक अक्षय कुमार ने ज्यादातर कोमेडी फिल्में की।

फ़िल्म हेरा फेरी (2002), मुझसे शादी करोगी (2004), गरम मसाला (2005) और जान-ए-मन (2006) में हास्य अभिनय के लिए फ़िल्म समीक्षकों द्वारा उनकी प्रशंसा की गई।

2007 में वे सफलता की ऊचाईयों को छूने लगे, जब उनके द्वारा अभिनीत चार लगातार कामर्सियल फिल्में हिट हुई। इस तरह से, उन्होंने अपने आपको हिन्दी फ़िल्म उद्योग में एक प्रमुख अभिनेता के रूप में स्थापित किया।

वे मार्शल आर्ट्स (सामरिक कला) की शिक्षा बेंगकोक में प्राप्त करके आए और वहां एक रसोइया की नौकरी भी करते थे। वे फिर मुंबई वापस आ गए, जहाँ वे मार्सल आर्ट्स की शिक्षा देने लगे। उनका एक विद्यार्थी जो एक फोटोग्राफर था, उसने उन्हें मॉडलिंग करने कहा। उस विद्यार्थी ने उन्हें एक छोटी कंपनी में एक मॉडलिंग असयांमेंट दिया। उन्हें कैमरे के सामने पोज देने के लिए, दो घंटे के 5,000 रुपये मिलते था। पहले की तनख्वाह 4000 रुपये प्रति महीने की तुलना में यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारण था कि वे क्यों मॉडल बने। मॉडलिंग करने के दो महीने बाद, कुमार को प्रमोद चक्रवर्ती ने अंततः अपनी फ़िल्म दीदार में अभिनय करने का मौका दिया।

करियर

कुमार बॉलीवुड में अभिनय की शुरूआत 1991 की फ़िल्मसौगंध से की, जो सराही नहीं गयी। उनकी पहली प्रमुख हिट 1992 की थ्रिलर फ़िल्म खिलाड़ी थी। 1993 का वर्ष उनके लिए अच्छा नहीं रहा क्योंकि उनकी अधिकतर फ़िल्म फ्लॉप हो गई। फ़िर भी, 1994 का वर्ष कुमार के लिए बेहतरीन वर्ष रहा जिसमें खिलाड़ी के साथ मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी और मोहरा जो साल का सर्वाधिक सफल फिल्मों में से था।

बाद में, यश चोपड़ा ने उन्हें रोमांटिक फ़िल्म ये दिल्लगी में लिया जो एक सफल फ़िल्म थी। उन्हें इस फ़िल्म के लिए सराहना मिली, जिसमें वे एक रोमांटिक किरदार में थे जो बहुत ही अलग था उनके एक्शन किरदार से।उन्हें फ़िल्मफेयर और स्टार स्क्रीन उत्सवों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए पहला नोमिनेशन मिला।ये सारी उपलब्धियां, कुमार को उस साल का सफलतम अभिनेता बना दिया।

1997 में, यश चोपड़ा की हिट फ़िल्म दिल तो पागल है में मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार में नामांकन हुआ। उसी साल, वे खिलाड़ी श्रेणी के पांचवें फ़िल्म मिस्टर एंड मिसेज़ खिलाड़ी में हास्य भूमिका में नजर आए।खिलाड़ी टायटल के साथ उनकी पिछली फिल्मों की तरह, यह फ़िल्म हिट हुई। और इस तरह इस फ़िल्म की तरह, उनका अगला खिलाड़ी नाम से रिलीज सारी फिल्में आने वाले साल में बॉक्स ऑफिस पर हिट होते चला गया। 1999 में, कुमार को फ़िल्म संघर्ष’ और जानवर में उनके किरदार के लिए अच्छी सराहना मिली।जबकि पहली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल हौ सकी, पर बाद में उन्हें सफलता मिली . 2000 में हास्य फ़िल्म हेरा फेरी में अभिनय किया जो हर लिहाज से सफल रही, और इस फ़िल्म में उन्होंने अपने आपको एक एक्शन और रोमांटिक भूमिकाओं की तरह एक सफल हास्य रोल भी अच्छी तरह निभाया।उन्होंने रोमांटिक फ़िल्म धड़कन में भी काम किया और बाद में उसी साल उसे काफ़ी सफलता मिली। 2001 में, फ़िल्म अजनबी में कुमार ने एक नकारात्मक किरदार निभाया। उनकी फ़िल्म को काफी सराहा गया तथा बेस्ट विलेन के लिए पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।

निजी जीवन

बॉलीवुड में रहने के दौरान, कुमार का नाम उनके साथ काम करने वाली कई अभिनेत्रियों के साथ जोड़ा गया जैसे रवीना टंडन, रेखा और शिल्पा शेट्टी। जाने माने कलाकार राजेश खन्ना और डिम्पल कपाड़िया की बेटी ट्विंकल खन्ना से दो बार सगाई होने के बाद अंत में उन्होंने 14 जनवरी 2001 में शादी कर ली। उनके बेटे का नाम आरव है जिसने 15 सितम्बर 2002 में जन्म लिया। वर्ष 2007 में, मुंबई के एक जाने-माने टेबलोयद समाचार पत्र ने एक ख़बर छापी कि उनकी पत्नी उन्हें छोड़ कर चली गई है और वे घर से बाहर निकल गयें हैं व एक होटल में रह रहे हैं।

26 जुलाई, 2007 को पति-पत्नी ने टेबलोयद को एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें यह बताया गया कि यह अफवाह झूठी थी।

महाराणा प्रताप जीवनी – Biography of Maharana Pratap

महाराणा प्रताप सिंह ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1597 तदानुसार 9 मई 1540– 19 जनवरी 1597) उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलो को कही बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कँवर के घर हुआ था। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20,000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80,000की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अशव दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17,000 लोग मारे गएँ। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंतीत हुई। 25,000 राजपूतों को 12 साल तक चले उतना अनुदान देकर भामा शाह भी अमर हुआ।

आरंभिक जीवन


महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जैवन्ताबाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ। बचपन से ही महाराणा प्रताप साहसी, वीर, स्वाभिमानी एवं स्वतंत्रताप्रिय थे। सन 1572 में मेवाड़ के सिंहासन पर बैठते ही उन्हें अभूतपूर्व संकोटो का सामना करना पड़ा, मगर धैर्य और साहस के साथ उन्होंने हर विपत्ति का सामना किया। मुगलों की विराट सेना से हल्दी घाटी में उनका भरी युद्ध हुआ। वहा उन्होंने जो पराक्रम दिखाया, वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय है, उन्होंने अपने पूर्वजों की मान – मर्यादा की रक्षा की और प्रण किया की जब तक अपने राज्य को मुक्त नहीं करवा लेंगे, तब तक राज्य – सुख का उपभोग नहीं करेंगे। तब से वह भूमी पर सोने लगे, वह अरावली के जंगलो में कष्ट सहते हुए भटकते रहे, परन्तु उन्होंने मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पण कर दिया। महाराणा प्रताप को बचपन में ही ढाल तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा क्योंकि उनके पिता उन्हें अपनी तरह कुशल योद्धा बनाना चाहते थे | बालक प्रताप ने कम उम्र में ही अपने अदम्य साहस का परिचय दे दिया था | जब वो बच्चो के साथ खेलने निकलते तो बात बात में दल का गठन कर लेते थे | दल के सभी बच्चो के साथ साथ वो ढाल तलवार का अभ्यास भी करते थे जिससे वो हथियार चलाने में पारंगत हो गये थे | धीरे धीरे समय बीतता गया | दिन महीनों में और महीने सालो में परिवर्तित होते गये | इसी बीच प्रताप अस्त्र श्श्त्र चलाने में निपुण हो गये और उनका आत्मविश्वास देखकर उदय सिंह फुले नही समाते थे | प्रताप Maharana Pratap ने अपने पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार उसके सौतेले भाई जगमाल को राजा बनाने का निश्चय किया लेकिन मेवाड़ के विश्वासपात्र चुंडावत राजपूतो ने जगमाल के सिंहासन पर बैठने को विनाशकारी मानते हुए जगमाल को राजगद्दी छोड़ने को बाध्य किया | जगमाल सिंहासन को छोड़ने का इच्छुक नहीं था लेकिन उसने बदला लेने के लिए अजमेर जाकर अकबर की सेना में शामिल हो गया और उसके बदले उसको जहाजपुर की जागीर मिल गयी | इस दौरान राजकुमार प्रताप को मेवाड़ के 54वे शाषक के साथ महाराणा का ख़िताब मिला | महाराणा प्रताप के काl में दिल्ली पर अकबर का शाषन था और अकबर की निति हिन्दू राजाओ की शक्ति का उपयोग कर दुसरे हिन्दू राजा को अपने नियन्त्रण में लेना था | 1567 में जब राजकुमार प्रताप को उत्तराधिकारी बनाया गया उस वक़्त उनकी उम्र केवल 27 वर्ष थी और मुगल सेनाओ ने चित्तोड़ को चारो और से घेर लिया था | महाराणा प्रताप ने वीरता का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह अद्वितीय है। उन्होंने जिन परिस्थितियों में संघर्ष किया, वे वास्तव में जटिल थी, पर उन्होंने हार नहीं मानी। यदि राजपूतो को भारतीय इतिहास में सम्मानपूर्ण स्थान मिल सका तो इसका श्रेय मुख्यत: राणा प्रताप को ही जाता है। उन्होंने अपनी मातृभूमि को न तो परतंत्र होने दिया न ही कलंकित। विशाल मुग़ल सेनाओ को उन्होंने लोहे के चने चबाने पर विवश कर दिया था। मुगल सम्राट अकबर उनके राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में मिलाना चाहते थे, किन्तु राणा प्रताप ने ऐसा नहीं होने दिया और आजीवन संघर्ष किया। महारानी जयवंता के अलावा राणा उदय सिंह की और भी पत्नियाँ थी जिनमे रानी धीर बाई उदय सिंह की प्रिय पत्नी थी | रानी धीर बाई की मंशा थी कि उनका पुत्र जगमाल राणा उदय सिंह का उत्तराधिकारी बने | इसके अलावा राणा उदय सिंह के दो पुत्र शक्ति सिंह और सागर सिंह भी थे | इनमे भी राणा उदय सिंह के बाद राजगद्दी सँभालने की मंशा थी लेकिन प्रजा और राणा जी दोनों ही प्रताप को ही उत्तराधिकारी के तौर पर मानते थे | इसी कारण यह तीनो भाई प्रताप से घृणा करते थे | महारानी जयवंता के अलावा राणा उदय सिंह की और भी पत्नियाँ थी जिनमे रानी धीर बाई उदय सिंह की प्रिय पत्नी थी | रानी धीर बाई की मंशा थी कि उनका पुत्र जगमाल राणा उदय सिंह का उत्तराधिकारी बने | इसके अलावा राणा उदय सिंह के दो पुत्र शक्ति सिंह और सागर सिंह भी थे | इनमे भी राणा उदय सिंह के बाद राजगद्दी सँभालने की मंशा थी लेकिन प्रजा और राणा जी दोनों ही प्रताप को ही उत्तराधिकारी के तौर पर मानते थे | इसी कारण यह तीनो भाई प्रताप से घृणा करते थे | महाराणा प्रताप का कद साढ़े सात फुट एंव उनका वजन 110 किलोग्राम था| उनके सुरक्षा कवच का वजन 72 किलोग्राम और भाले का वजन 80 किलो था| कवच, भाला, ढाल और तलवार आदि को मिलाये तो वे युद्ध में 200 किलोग्राम से भी ज्यादा वजन उठाए लड़ते थे| आज भी महाराणा प्रताप का कवच, तलवार आदि वस्तुएं उदयपुर राजघराने के संग्रहालय में सुरक्षित रखे हुए है|

हल्दीघाटी का युद्ध


हल्दीघाटी का युद्ध भारत के इतिहास की एक मुख्य कड़ी है। यह युद्ध 18 जून 1576 को लगभग 4 घंटों के लिए हुआ जिसमे मेवाड और मुगलों में घमासान युद्ध हुआ था। महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व एक मात्र मुस्लिम सरदार हाकिम खान सूरी ने किया और मुग़ल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था। इस युद्ध में कुल 20000 महारण प्रताप के राजपूतों का सामना अकबर की कुल 80000 मुग़ल सेना के साथ हुआ था जो की एक अद्वितीय बात है। कई मुश्किलों/संकटों का सामना करने के बाद भी महारण प्रताप ने हार नहीं माना और अपने पराक्रम को दर्शाया इसी कारण वश आज उनका नाम इतहास के पन्नो पर चमक रहा है। कुछ इतिहासकार कुछ ऐसा मानते हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ परन्तु अगर देखें तो महाराणा प्रताप की ही विजय हुए है। अपनी छोटी सेना को छोटा ना समझ कर अपने परिश्रम और दृढ़ संकल्प से महाराणा प्रताप की सेना नें अकबर की विशाल सेना के छक्के छुटा दिए और उनको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।

घोड़ा चेतक


महाराणा प्रताप की वीरता के साथ साथ उनके घोड़े चेतक की वीरता भी विश्व विख्यात है| चेतक बहुत ही समझदार और वीर घोड़ा था जिसने अपनी जान दांव पर लगाकर 26 फुट गहरे दरिया से कूदकर महाराणा प्रताप की रक्षा की थी| हल्दीघाटी में आज भी चेतक का मंदिर बना हुआ है| राजस्थान के कई परिवार अकबर की शक्ति के आगे घुटने टेक चुके थे, किन्तु महाराणा प्रताप अपने वंश को कायम रखने के लिये संघर्ष करते रहे और अकबर के सामने आत्मसर्मपण नही किये।जंगल-जंगल भटकते हुए तृण-मूल व घास-पात की रोटियों में गुजर-बसर कर पत्नी व बच्चे को विकराल परिस्थितियों में अपने साथ रखते हुए भी उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। पैसे के अभाव में सेना के टूटते हुए मनोबल को पुनर्जीवित करने के लिए दानवीर भामाशाह ने अपना पूरा खजाना समर्पित कर दिया। तो भी, महाराणा प्रताप ने कहा कि सैन्य आवश्यकताओं के अलावा मुझे आपके खजाने की एक पाई भी नहीं चाहिए। अकबर के अनुसारः- महाराणा प्रताप के पास साधन सीमित थे, किन्तु फिर भी वो झुका नही, डरा नही। महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी के युद्ध के बाद का समय पहाङों और जंगलों में व्यतीत हुआ। अपनी पर्वतीय युद्ध नीति के द्वारा उन्होंने अकबर को कई बार मात दी। यद्यपि जंगलो और पहाङों में रहते हुए महाराणा प्रताप को अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पङा, किन्तु उन्होने अपने आदर्शों को नही छोङा। महाराणा प्रताप के मजबूत इरादो ने अकबर के सेनानायकों के सभी प्रयासों को नाकाम बना दिया। उनके धैर्य और साहस का ही असर था कि 30 वर्ष के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बन्दी न बना सका। महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा ‘चेतक‘ था जिसने अंतिम सांस तक अपने स्वामी का साथ दिया था।

महिला शक्ति प्रतीक व बसपा अध्यक्ष मायावती की जीवनी :

महिला शक्ति प्रतीक व बसपा अध्यक्ष मायावती की जीवनीदेश की महिला राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाली मायावती भारत की शक्तिशाली महिलाओं की सूची में आती हैं. मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हैं और 4 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने वाली नेता हैं. मायावती दलित समाज से आती हैं. मायावती को आयरन लेडी के नाम से भी जाना जाता हैं.

बहुत ही कम लोगो को मालूम हैं की शुरू में बहिन जी आईएएस की तैयारी करना चाहती थी लेकिन राजनीति की दिलचस्पी उन्हें राजनीति में ले आई. आगे चलकर मायावती उत्तर प्रदेश का बड़ा चेहरा उभरकर सामने आई. 1977 में बहिन जी कांशीराम के संपर्क में आई और उन्होंने पूर्णकालीन राजनेता बनने की प्रतिज्ञा ले ली

पूरा नाम – मायावती नैना कुमारी

जन्म – 15 जनवरी 1956, नई दिल्ली, भारत

पिता – प्रभु दयालमाता – रामरती

उपनाम – बहिन जी और आयरन लेडी

राजनैतिक पार्टी – बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय

अध्यक्षधर्म – हिन्दू

विवाह – अविवाहित

भाई-बहिन – 6 भाई और एक बहिन

मायावती की व्यक्तिगत जीवन :

बहिन जी अर्थात मायावती जी जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में हुआ था. इनके पिता प्रभु दयाल एक सरकारी डाक विभाग में प्रधान के पद पर रह चुके हैं. मायावती जी के पूर्वज गौतम बुद्ध नगर उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे. बहिन जी दलित परिवार से हैं. मायावती ने 1975 में कालिंदी कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से बी. ए. किया और 1976 में बी एम. एल. कॉलेज गाजियाबाद उत्तरप्रदेश से शिक्षा प्राप्त की. बाद में बहिन जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एल. एल. बी. किया. बहिन जी ने कभी भारतीय प्राशसनिक सेवा की परीक्षाओं के लिये भी अप्लाई किया था.राजनीति में मायावती :

1977 में कांशीराम के संपर्क में आने के बाद बहिन जी ने यह ठान लिया कि उन्हें राजनीति में अपना कैरियर बनाना हैं और 1984 में बहुजन समाज पार्टी की नीवं रखी थीं.राजनैतिक जीवन :

1989 में बहिन जी उत्तर प्रदेश के बिजनौर सीट से सांसद बनी.1994 में बहिन जी उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिये निर्वाचित हुई.

1995 में बहिन जी को पहली बार उत्तर प्रदेश में भारतीय दलित महिला के रूप में पहली बार मुख्यमंत्री की शपथ ली.मायावती 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के पद पर रह चुकी हैं पहली बार ” 3 जून 1995 से लेकर 18 अक्टूबर 1995 ” तक. दूसरी बार मुख्यमंत्री के तौर पर ” 21 मार्च 1997 से लेकर 20 सितम्बर 1997 ” तक ये भी इनका छोटा कार्यकाल रहा. तीसरी बार ” 3 मई 2002 से लेकर 26 अगस्त 2003 ” तक. चौथी बार ” 13 मई 2007 से लेकर 6 मार्च 2012 ” तक, ये रहा बहिन जी का मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल.

बसपा की सुप्रीमो :

कांशीराम ने 15 दिसम्बर 2001 को उत्तर प्रदेश के राजनीतिक रैली के दौरान मायावती को उनके अगले उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित किया. मायावती 2003 में बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गयी. मुख्यमंत्री के तौर मायावती ने कुशल प्रशासन और कानून को बढ़ावा देने ले लिये नाम कमाया.मुर्तियो का निर्माण :मुख्यमंत्री के समय मायावती ने अपने कार्यकाल के दौरान गौतम बुद्ध, गाडगे महराज, संत रविदास, कबीरदास, ज्योतिराव फुले और भीम राव अम्बेडकर आदि हिन्दू और बौद्ध तथा दलित प्रतिक आदि का जमकर निर्माण करवाया. उनके शासन काल के दौरान सरकारी खर्च ज्यादा हुआ था. 2011 में बहिन जी ने 685 करोड़ की लागत से निर्मित राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थान और ग्रीन गार्डन का ओपनिंग करवाया था. इस लिये मायावती पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा करदाताओं के पैसे बर्बाद करने के आरोप लगे थेंमायावती पर कुछ किताबें प्रकाशित हुई :बहिन जी पर कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई जिसमें उनकी आत्मकथात्मक भी शामिल हैं. लोहे महिला, कुमारी मायावती, उनकी आत्मकथाएँ हैं . मेरा संघर्ष और बहुजन समाज का एक त्रैवाल्गेज, बिजांजी.

एक नजर मायावती के कुछ सफल जीवन पर :

1. 1985 और 1987 में मायावती ने लोकसभा चुनाव में कड़ी मेहनत की और उनको सफलता भी मिली. 1989 में बसपा को 13 सीटो पर जीत मिली.

2. धीरे-धीरे बहिन जी और उनकी पहचान दलित और पिछड़े वर्ग में बढ़ती गयी और 1995 में बहिन जी उत्तर प्रदेश में गठबंधन के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बनी.

3. 2001 के समय पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने मायावती को बहुजन समाज पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया.

4. मुख्यमंत्री के समय मायावती ने कई मुर्तिया और स्मारक भी बनाये जो विवादों में भी रहें.

5. 2016 में मोदी के नोटबंदी के विरोध के मामले में पॉपुलर रही थीं. एक मायावती नोटों की माला पहन कर या फिर विदेश से अपने लिये सैंडल के लिये डिमांड करने का.

भले ही मायावती अपने राजनीतिक जीवन काल में बहुत विवादों में रही लेकिन महिला का किसी राज्य का मुख्यमंत्री बन जाना और किसी पार्टी का अध्यक्ष होना बहुत बड़ी बात है. जो मायावती को उनकी ज़िन्दगी में एक सफल राजनेता बनाता है. मायावती अभी तक अविवाहित है जो की उनके पाने कार्यो के प्रति लगन और उनके सिद्धांतो को दर्शाता है. हमारे देशवासियों को ऐसी महिला राजनेता पर गर्व होना चाहिए.