सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का शस्त्र है। इसको उन्होंने स्वयं तथा उनके कृष्ण अवतार ने धारण किया है। किंवदंती है कि इस चक्र को विष्णु ने गढ़वाल के श्रीनगर स्थित कमलेश्वर शिवालय में तपस्या कर के प्राप्त किया था।

सुदर्शन चक्र अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाने वाला एक चक्र, जो चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुँचकर वापस आ जाता है। यह चक्र भगवानविष्णु को ‘हरिश्वरलिंग’ (शंकर) से प्राप्त हुआ था।[1] सुदर्शन चक्र को विष्णु ने उनके कृष्ण के अवतार में धारण किया था। श्रीकृष्ण ने इस चक्र से अनेक राक्षसों का वध किया था। सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इस चक्र ने देवताओं की रक्षा तथा राक्षसों के संहार में अतुलनीय भूमिका का निर्वाह किया था।

सुदर्शन चक्र एक ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और उसका काम तमाम करके वापस छोड़े गए स्थान पर आ जाता था। चक्र को विष्णु की तर्जनी अंगुली में घूमते हुए बताया जाता है। सबसे पहले यह चक्र उन्हीं के पास था। सिर्फ देवताओं के पास ही चक्र होते थे। चक्र सिर्फ उस मानव को ही प्राप्त होता था जिसे देवता लोग नियुक्त करते थे।

श्रीकृष्‍ण और दाऊ के मुख से सुदर्शन प्राप्त करने वाली घटना सुनकर सत्यकि तो सुन्न ही रह गया था। यादवों के तो हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। उत्सव जैसा माहौल था। अत्यंत हर्ष के साथ दो दिनों तक भृगु आश्रम में रहने के बाद क्रौंचपुर के यादव राजा सारस के आमंत्रण पर उनके राज्य के लिए निकल पड़े। उनके सेनापति उनकी एक टुकड़ी के साथ उनका मार्गदर्शन कर रहे थे। राजा सारस ने एक विशेष राज्यसभा का आयोजन किया।

राजा सारस ने सभी अतिथियों को सालंकृत, सुशोभि‍त छत्र और अश्वों सहित राजरक्ष उपहार में दिए थे। कृष्ण को अपने अश्व दारुक, शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक अश्‍वों की याद आ गई। रथों को देखकर उनको अपने गरूड़ध्वज रथ की भी याद आ गई। वहीं पर अब कृष्‍ण को लगने लगा था कि उनको मथुरा लौटना चाहिए। अब किसी भी प्रकार का भय नहीं रहा क्योंकि अब सुदर्शन चक्र जो है। मुझे मथुरा लौटकर अपने बंधु बांधवों आदि की रक्षा करनी है। श्रीकृष्‍ण ने वहां से विदा होने से पहले राजा सारस ने सहायता करने का वचन लिया।

वहां से वे ताम्रवर्णी नदी पार कर घटप्रभा के तट पर आ गए। वहां एक सैन्य शिविर में सत्यकि के साथ मथुरा जाने की योजना बनाने लगे। यात्रा में आने वाली रुकावटों पर चर्चा करने लगे। इस महत्वपूर्ण मीटिंग में ‍दक्षिण देश के चारों राज्यों के सेनापति भी शामिल थे। सभी अपनी-अपनी राय रख रहे थे। श्रीकृष्ण सभी की सुन रहे थे लेकिन उनका मन तो सुदर्शन चक्र के मंत्र में ही खोया हुआ था। जबसे उनको यह प्राप्त हुआ तब से उनकी मानसिक दशा बदल चुकी थी। वे इसकी शक्ति, कार्यों और इसके उचित समय पर इस्तेमाल करने के बारे में सोचने लगे थे। अब उनकी दृष्टि दूर तक भविष्य में उड़ान भरने लगी थी। शक्ति का यह आभास देह, मन और काल से भी परे था। वे अब साधारण मानव नहीं थे।

श्रीकृष्ण सुदर्शन के बारे में सोच रहे थे तभी गुप्तचर विभाग का एक प्रमुख हट्टे-कट्टे नागरिक को पकड़कर उनके सामने ले आया। नागरिक ने करबद्ध अभिनन्नक कर कहा- मैं करवीर का नागरिक हूं आपसे न्याय मांगने आया हूं। हे श्रीकृष्ण महाराज! पद्मावत राज्य के करवीर नगर का राजा श्रगाल हिंसक वृत्ति का हो गया है। वह किसी की भी स्त्री, संपत्ति और भूमि को हड़प लेता है। कई नागरिक उसके इस स्वभाव से परेशान होकर राज्य छोड़ने पर मजबूर हैं। क्या मुझे भी राज्य छोड़ना पड़ेगा?

श्रीकृष्ण उठकर उसके समीप गए और उससे कहा, ‘हे श्रेष्ठ मैं किसी राज्य का राजा नहीं हूं। न में किसी राजसिंहासन का स्वामी हूं फिर भी मैं तुम्हारी व्यथा समझ सकता हूं।’ वह नागरिक श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ा और सुरक्षा की भीख मांगने लगा। तब श्रीकृष्ण ने सेनापति सत्यकि की ओर मुखातिब होकर कहा कि हम करवीर से होते हुए मथुरा जाएंगे।

श्रीकृष्ण और उनकी सेना करवीर की ओर चल पड़ी। पद्मावत राज्य के माण्डलिक श्रगाल का पंचगंगा के तट पर बसा करवीर नामक छोटा सा राज्य था। करवीर के दुर्ग पर यादवों की सेना ने हमला कर दिया। दुर्ग को तोड़कर सेना अंदर घुस गई। श्रगाल और यादवों की सेना में घनघोर युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण राजप्रासाद तक पहुंच गए। ऊपर श्रगाल खड़ा था और नीचे श्रीकृष्ण। श्रगाल ने चीखकर श्रीकृष्ण को कहा, यह मल्लों की नगरी करवीर है, तू यहां से बचकर नहीं जा सकता। मैं ही यहां का सम्राट हूं।

तभी कृष्ण का मन मचल गया उस सुदर्शन चक्र का प्रयोग करने का। अब मौका था कि इसे आजमाया जाए। उन्होंने मंत्र बुदबुदाया और चमत्कार हुआ। उनकी तर्जनी अंगुली पर गरगर करने लगा था वह प्रलयंकारी चक्र और श्रीकृष्ण ने सुदर्शन का पहला प्रक्षेपण कर दिया। पलक झपकने से पहले ही वह श्रगाल का सिर धड़ से अलग कर पुन: अंगुली पर विराजमान हो गया। दोनों ओर की सेनाएं देखती रह गईं और चारों तरफ सन्नाटा छा गया। श्रीकृष्ण को भी समझ में नहीं आया। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि सभी आवाक् रह गए। आश्चर्य कि चक्र में रक्त की एक बूंद भी नहीं लगी हुई थी।

करवीर नगरी अब श्रगाल से मुक्त हो गई थी। श्रीकृष्ण ने श्रगाल के पुत्र शुक्रदेव को वहां का राजा नियुक्त किया तथा उसको उपदेश देकर वे वहां से चले गए। वहां के बाद कुंतल, अश्मक जनपदों को पीछे छोड़ते हुए यादवों की सेना ने विदर्भ में पड़ाव डाला। जहां पड़ाव डाला था वहां से कुछ योजन दूर पर ही कौण्डिन्यपुर था, जहां के राजा भीष्मक जरासंध से हाथ मिला चुका था। उनका पुत्र रुक्मी था, जो शिशुपाल का मित्र था। रुक्मी की बहन ही रुक्मिणी थी। उसके और भी भाई थे।

यहां से चलने के बाद एक माह की कठिन यात्रा के बाद यादव सेना दण्डकारण्य पार कर अवंती राज्य के भोजपुर नगर पहुंच गई। यह कुंति बुआ के पालक पिता राजा कुंतिभोज का नगर था। यहां अचानक ही श्रीकृष्ण की गर्ग मुनि से भेंट हुई। वे पश्‍चिम सागर तट पर स्थित अजितंजय नगर के यवन राजा से मिलकर आ रहे थे। श्रीकृष्ण के पास इसी नाम (अजितंजय) से एक धनुष भी था। दूर गांधार, काब्रा नदी के प्रदेश के लोगों को ‘यवन’ कहा जाता था।

अंतत: कुछ दिन कुंतिभोज के नगर में विश्राम करने के बाद वे यादव सेना सहित मथुरा पहुंच गए। यहां महाराजा उग्रसेन, तात वसुदेव, भ्राता ऊधो और अन्य विशिष्ट यादवों ने उनका स्वागत किया। श्रीकृष्ण के मथुरा पहुंचने से पहले ही जरासंध पर उनकी विजय का समाचार भी पहुंच गया था। वहां उन्होंने वसुदेव को उनकी बहन कुंति और उनके पुत्र पांडवों की रक्षा का वचन दिया। यहीं रहकर उन्होंने विदर्भ राज्य की पुत्री रुक्मिणी का अपहरण कर उसके साथ विवाह भी किया।