बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि आखिरकार श्रीकृष्ण के पास सुदर्शन चक्र कैसे और क्यूं आया। अर्थात किस तरह उन्हें सुदर्शन चक्र मिला। इस संबंध में हम आपको….सुदर्शन प्राप्ति और उसके प्रथम संचालन का अद्भुत वर्णन… कंस वध के बाद श्रीकृष्ण को मथुरा छोड़कर जाना पड़ा था। कंस वध के बाद मथुरा पर शक्तिशाली मगध के राजा जरासंध के आक्रमण बढ़ गए थे। मथुरा पर उस वक्त यादव राजा उग्रसेन का आधिपत्य था।

श्रीकृष्ण ने सोचा, मेरे अकेले के कारण यादवों पर चारों ओर से घोर संकट पैदा हो गया है। मेरे कारण यादवों पर किसी प्रकार का संकट न हो, यह सोचकर भगवान कृष्ण ने बहुत कम उम्र में ही मथुरा को छोड़कर कहीं अन्य जगह सुरक्षित शरण लेने की सोची। दक्षिण में यादवों के 4 राज्य थे। पहला राज्य आदिपुरुष महाराजा यदु की 4 नागकन्याओं से प्राप्त 4 पुत्रों ने स्थापित किया था। यह राज्य मुचकुन्द ने दक्षिण ऋक्षवान पर्वत के समीप बसाया था। दूसरा राज्य पद्मावत महाबलीश्वरम के पास था। यदु पुत्र पद्मवर्ण ने उसे सह्माद्रि के पठार पर वेण्या नामक नदी के तट पर बसाया था। पंचगंगा नदी के तट पर बसी करवीर नामक वेदकालीन विख्यात नगरी भी इसी राज्य के अंतर्गत आती थी। उस पर श्रंगाल नामक नागवंशीय माण्डलिक राजा का आधिपत्य था। करवीर नगरी को दक्षिण काशी कहा जाता था।

उसके दक्षिण में यदु पुत्र सारस का स्थापित किया हुआ तीसरा राज्य क्रौंचपुर था। यहां क्रौंच नामक पक्षियों की अधिकता थी इसीलिए इसे क्रौंचपुर कहा जाता था। वहां की भूमि लाल मिट्टी की और उर्वरा थी। इस राज्य को ‘वनस्थली’ राज्य भी कहा जाता था। चौथा राज्य यदु पुत्र हरित ने पश्‍चिमी सागर तट पर बसाया था। इन चारों राज्यों में अमात्य विपृथु ने पहले ही दूतों द्वारा संदेश भिजवाए थे कि श्रीकृष्ण पधार रहे हैं।

पद्मावत राज्य में वेण्या नदी के तट पर भगवान परशुराम निवास करते थे। महेंद्र पर्वत से अर्थात पूर्व समुद्र से परशुराम नौकाओं में से अपने अनेक शिष्यों सहित पद्मावत राज्य में आए थे। संपूर्ण आर्यावर्त में मंत्र सहित ब्रह्मास्त्र विद्या देने की क्षमता रखने वाले इने-गिने पुरुषों में वे सर्वश्रेष्ठ थे। उनके चमत्कार और शक्ति के किस्से सभी को मालूम थे। उनके शिष्य आर्यावर्त में सर्वत्र फैले हुए थे। उनके प्रत्येक राज्य में अनेक आश्रम थे।

दाऊ से विचार-विमर्श कर श्रीकृष्‍ण ने निर्णय लिया कि सबसे पहले उनसे ही मिला जाए। उनसे मिलने के लिए कई नदियों और अरण्यों को लांघते हुए, समीपवर्ती विदर्भ राज्य की सीमा पर गोदावरी नदी पार करते हुए वे सभी अश्मक राज्य में आ गए। श्रीराम ने जहां निवास किया था, उस कुंतल राज्य के जनस्थान पर्वत नासिक परिसर के बाईं ओर से भीमा नदी को पार करते हुए वे सभी पद्मावत राज्य की सीमा में दाखिल हो गए।

परशुराम के आश्रम में श्रीकृष्‍ण : कृष्णा और कोयना के संगम में सभी ने स्नान किया। फिर करहाटक तीर्थक्षेत्र को पार कर वे वेण्या नदी के परिसर में आ गए। सभी के स्वागत के लिए परशुराम द्वारा भेजे गए कंधों पर चमकते हुए परशु लिए दो जटाधारी उनके पास आ खडे हुए। यहां तक की यात्रा में लगभग डेढ़ माह बीत चुका था। आश्रम के प्रदेश द्वार पर भृगुश्रेष्ठ परशुराम और सांदीपनि उनके स्वागत के लिए खड़े थे। दोनों ने श्रीकृष्ण और दाऊ को गले लगा लिया। आश्रम में परशुराम ने सभी को फलाहार खिलाया और सभी के रुकने और विश्राम करने की व्यवस्था की।
विश्रामआदि के बाद परशुराम ने कहा कि अब मेरी सलाह है कि तुम अपने साधियों के साथ नैसर्गिक संरक्षण प्राप्त गोमंतक पर्वत पर चले जाओ। तुम्हारे लिए मैंने अब तक एक अमूल्य उपहार संभालकर रखा है। अपने हाथों से उसे सौंपकर मैं उससे मुक्त होना चाहता हूं। अन्य किसी को वह मैं दे नहीं सकता किसी योग्य व्यक्ति का ही इंतजार कर रहा था लेकिन अभी योग्य समय नहीं आया। अभी तुम गोमांतक पर्वत पर जाओ।

श्रीकृष्ण पहुंच गए गोमांतक पर्वत : उल्लेखनीय है कि गोमांतक पर्वत पर रहने वाले गरूड़ के पुत्र थे– वेन्तेय। वे किसी बीमारी की वजह से पूरी तरह अपंग हो गए थे। जब वे कृष्ण से मिले तो उनमें एक नया संचार हो गया। उनकी बीमारी पूरी तरह ठीक हो गई। गोमांतक पर्वत पार करके सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग था और उसके पार लगभग 32 किलोमीटर दूर कुशस्थली थी जिसे बाद में द्वारिका कहा गया।

यहां पर दाऊ और श्रीकृष्ण ने अपने कुछ साथियों सहित संपूर्ण पर्वत को घूम-घूमकर देखा। जंगल का मुआयना किया। गोमांतक पर्वत यादवों के एक पड़ाव व एक सैन्य शिविर में बदल गया। यहां आए हुए यादवों को अभी एक माह ही हुआ था कि जरासंध की सेना वहां आ धमकी। दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में हार और हताशा के कारण जरासंध ने गोमंतक पर्वत के चारों ओर आग लगाने का आदेश दिया। बाद में यादवों ने दक्षिण देश की सेना से हाथ मिलाया और जरासंध व शिशुपाल पर अचानक एक शक्तिशाली आक्रमण किया। मगध और चेदियों के शस्त्र संभालने के पहले ही युद्ध आरंभ हो गया। अंतत: सभी भाग गए और जहां जरासंध और शिशुपाल ने पड़ाव डाला था, वहीं यादवों की सेना ने पड़ाव डालकर विश्राम किया।

परशुराम पधारे गोमांतक पर्वत पर : इस विजय के बाद एक दिन श्रीकृष्‍ण अपने भाई दाऊ और साथी विपृथु और कुछ गिने-चुने यादवों के साथ परशुराम से मिलने गए और उनको जरासंध के आक्रमण का हाल सुनाया। श्रीकृष्ण ने कहा कि उस निर्दयी ने गोमंतक जैसा अद्भुत पर्वत जला डाला। तब परशुराम ने कहा- हे श्रीकृष्ण, मुझे तुम्हारी आंखों में अपना उत्तराधिकारी दिखाई दिया है अत: में आज तुमको वह उपहार सौंपता हूं जिसके तुम ही एकमात्र योग्य हो और जिसके बारे में मैं तुम्हें अपनी पहली मुलाकात में बताया था। अब वह समय आ गया है कि मैं तुम्हें वह सौंप दूं।

तब परशुराम ने धीरे-धीरे अपनी आंखें बंद कर लीं और कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे। ऐसे मंत्र जो पहले कभी श्रीकृष्‍ण ने भी नहीं सुने थे। तभी तेज प्रकाश उत्पन्न हुआ और संपूर्ण आश्रम प्रकाश से भर गया। दाऊ, श्रीकृष्ण आदि सभी की आंखें चौंधिया गईं। जब प्रकाश मध्यम हुआ, तब उन्होंने देखा कि परशुराम की दाहिनी तर्जनी पर 12 आरों वाला वज्रनाभ गरगर घूमने वाला सुदर्शन चक्र घूम रहा है। उसे देखकर सभी चकित होकर भयभीत भी हो गए। परशुराम की तर्जनी पर घूमता चक्र स्पष्ट दिखाई दे रहा था। परशुराम ने नेत्र संकेत से श्रीकृष्‍ण को नजदीक बुलाया और कान में कहा, प्रत्यक्ष ही देखो, इस सुदर्शन चक्र के प्रभाव को। उन्होंने मंत्र बुदबुदाते हुए उस तेज चक्र को प्रक्षेपित कर दिया और वह तेज गति से वेण्या नदी को पार कर आंखों से ओझल हो गया। कुछ ही देर बाद वह पुन: लौटता हुआ दिखाई दिया और वह उसी वेग से लौटकर पुन: तर्जनी अंगुली पर स्थिर हो गया। परशुराम ने पुन: कुछ मंत्र बुदबुदाया और फिर वह जैसे प्रकट हुआ था, वैसे ही लुप्त हो गया।

तब परशुराम ने श्रीकृष्ण को आचमन कराकर उनको सुदर्शन की दीक्षा देकर कहा, आज से मेरे इस सुदर्शन चक्र के अधिकारी तुम हो गए हो। हे वासुदेव, इसकी जन्मकथा तो तुम जानते ही हो। सबसे पहले यह शिव के पास था। इससे त्रिपुरासुर की जीवनलीला समाप्त कर दी गई थी। उसके बाद यह विष्णु…ऐसा बोलकर परशुराम मुस्कराने लगे। विष्णु क्या हैं? यह मैं तुम्हें क्या बताऊं वासुदेव श्रीकृष्ण। तुम जानते ही हो। विष्णु के बाद यह चक्र अग्नि के पास था। अग्नि ने वरुण को दिया और वरुण से यह मुझे प्राप्त हुआ है। हे वासुदेव, बलराम के हल से इस धरती में बीज बोने हैं और इस सुदर्शन चक्र से इस धरती की रक्षा करनी है। आज से यह तुम्हारा हुआ जिम्मेदारी से इसका उपयोग करना।