ब्रह्माजी के ये रहस्य जानकर आप चौंक जाएंगे

ब्रह्मा हिन्दू धर्म में एक प्रमुख देवता हैं। ये हिन्दुओं के तीन प्रमुख देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से एक हैं। ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। सृष्टि रचियता से मतलब सिर्फ ‍जीवों की सृष्टि से है। तीनों देवताओं में ब्रह्माजी का चित्रण प्रथम और सबसे वृद्ध देवता के रूप में किया गया है, लेकिन ब्रह्मा को वह दर्जा प्राप्त नहीं है जो विष्णु और शिव को है। वृद्ध पिता की तरह देव परिवार में इनका स्थान उपेक्षित होता गया। ब्रह्माजी तो शिवजी के काल में भी थे और राम के काल में उनके पुत्र वशिष्ठजी के साथ थे। महाभारत काल में भी उन्होंने कृष्ण की मदद की थी।
विष्णु से वैष्णव और भागवत धर्म का सूत्रपात्र होता है तो शिव से शैव धर्म का, जबकि ब्रह्मा के हाथों में वेद ग्रंथों का चित्रण किया गया है। उनकी पत्नीं गायत्री के हाथों में भी वेद ग्रंथ है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह वैदिक धर्म का पालन करते थे। शैव और शाक्त आगम संप्रदायों की तरह ही ब्रह्माजी की उपासना का भी एक विशिष्ट संप्रदाय है, जो वैखानस संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है।

माध्व संप्रदाय के आदि आचार्य भगवान ब्रह्मा ही माने जाते हैं। इसलिए उडुपी आदि मुख्य मध्वपीठों में इनकी पूजा-आराधना की विशेष परम्परा है। देवताओं तथा असुरों की तपस्या में प्राय: सबसे अधिक आराधना इन्हीं की होती है। खैर, आखिर ब्रह्मा को क्यों नहीं पूजा जाता है और क्या माता सरस्वती उनकी पुत्री थीं। जानिए ब्रह्माजी के बारे में ऐसा ही कुछ रहस्य…

कौन है ब्रह्मा : ब्रह्मा को विश्व के आद्य सृष्टा, प्रजापति, पितामह तथा हिरण्यगर्भ कहते हैं। पुराणों में जो ब्रह्मा का रूप वर्णित मिलता है वह वैदिक प्रजापति के रूप का विकास है। प्राजापति उसे कहते हैं जिससे प्राजाओं की उत्पत्ति हो अर्थात जिससे परिवार, कुल और वंश की वृद्धि हो। ब्रह्मा के पुत्रों को भी प्राजापित कहा जाता है।
ब्रह्माजी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं। सभी देवता ब्रह्माजी के पौत्र माने गए हैं, अत: वे पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। वे अपने चार हाथों में क्रमश: वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद तथा कमण्डलु धारण किए हैं।

यदि हम पश्चिमी धर्म का अध्ययन करेंगे तो ब्रह्मा और उनके कुल के संबंध में वहां भी भिन्न रूप में कहानियां मिलेगी जो ब्रह्मा और उनके कुल की कहानी से मिलती जुलती है। प्रारंभ में चूंकि वंशवृद्धि करना थी और मानव जाति के विस्तार करना था जो सभी ने आपस में ही संबंध बानकर सृष्‍टि रचना का विस्तार किया था। जैसा कि बाइबिल में उल्लेख मिलता है कि आदम के पुत्रों के पुत्रों और उनके पुत्र-पुत्रियों ने आपस में विवाह करके वंश का विस्तार किया था।

बाइबिल में जिसे उत्पत्ति कथा कहते हैं उसे पुराणों में सृष्टि रचना कथा कहा गया है। ब्रह्मा के पुत्र और पौत्रों के वंश की कथा का विस्तार मिलता है। बहुत से लोग अब्राहम को ब्रह्मा से और नूह को मनु से जोड़कर देखते हैं। कहते हैं कि जब सरस्वती नदी में तूफान शुरू हुआ तब अब्राहम के पिता अपने परिवार के साथ यह क्षेत्र छोड़कर उर प्रदेश में जाकर बस गए थे। ह. अब्राहम (ह. इब्रिहिम) के पिता का नाम तेरह था जिनकी तीन संतानें अब्राहम, नाहूर और हराम। नूह के दूसरे बेटे शेम की नौवीं पीढ़ी में तेरह हुआ।

ब्रह्मा उत्पत्ति कथा : ब्रह्मा की उत्पत्ति जल में उत्पन्न कमल पर हुई। उन्होंने कमल के डंठल के अंदर उतरकर उसका मूल जानने का प्रयास किया लेनिक नहीं जान पाए। तब वह पुन: कमल आकर कमल पर विराजमान होकर सोचने लगे कि मैं कहां से और कैसे उत्पन्न हुआ। तभी एक शब्द सुनाई दिया ‘तपस तपस’। तब ब्रह्मा ने सौ वर्षों तक वहीं आंख बंद कर तपस्या की। फिर ब्रह्मा को भगवान विष्णु की प्रेरणा से सृष्टि रचना का आदेश मिला। उन्होंने तब सर्व प्रथम चार पुत्रों की उत्पत्ति की। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार। ये चारों भी सृष्टि रचना छोड़कर तपस्या में लीन हो गए। अपने पुत्रों की इस हरकत से जब ब्रह्मा क्रोधित हुए तो उनकी भौहों से एक बालक का जन्म हुआ। यह बालक रोने लगा तो इसका नाम रुद्र रख दिया गया। फिर ब्रह्मा ने विष्णुजी की शक्ति से 10 तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया। उनके ना म है मारीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, पुलत्स्य, क्रतु, वशिष्ठ, दक्ष, भृगु और नारद। उनके मुख से पुत्री वाग्देवी की उत्पत्ति हुई। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो अंश किए एक अंश से पुरुषरूप मनु और दूसरे से स्त्री रूप शतरूपा को जन्म दिया। मनु और शतरुपा की संतानों को रहने के लिए श्रीहरि ने वराह रूप धारण कर धरती का उद्धार किया।

सदाशिव और मां दुर्गा : पुराणों ने ब्रह्मा की कहानी को मिथकरूप में लिखा। पुराणों के अनुसार क्षीरसागर में शेषशायी विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा की स्वयं उत्पत्ति हुई, इसलिए ये स्वयंभू कहलाते हैं। शिवपुराण अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माता पिता सदाशिव और दुर्गा हैं, जो काशी में निवास करते थे। यह कथा इस प्रकार है:- इस आनंदरूप वन काशी में रमण करते हुए एक समय शिव और शिवा को यह इच्‍छा उत्पन्न हुई ‍कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए, जिस पर सृष्टि निर्माण (वंशवृद्धि आदि) का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें। ऐसा निश्‍चय करके शक्ति सहित परमेश्वररूपी शिव ने अपने वामांग पर अमृत मल दिया। फिर वहां से एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित होकर कहा, ‘वत्स! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम ‘विष्णु’ विख्यात होगा।’
विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके ब्रह्माजी को अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही उन्हें विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में हिरण्यगर्भ (जल के गर्भ से) ब्रह्मा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी उस कमल के सिवाय दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं मानते थे। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरा क्या कार्य है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूं और किसने इस समय मेरा निर्माण किया है? इस प्रकार संशय में रहने के बाद वे जल में ही तपस्या में लीन हो जाते हैं। बाद में सदाशिव के विभूतिस्वरूप से रुद्र और महेश्वर का जन्म हुआ। देवीभागवत पुराण में सदाशिव पत्नीं देवी दुर्गाजी हिमालय को ज्ञान देते हुए कहती है कि एक सदाशिव ब्रह्म की साधना करो। जो परम प्रकाशरूप है। वही सब के प्राण और सबकी वाणी है। वही परम तत्व है। उसी अविनाशी तत्व का ध्यान करो। वह ब्रह्म ओंकारस्वरूप है और वह ब्रह्मलोक में स्थित है।

ब्रह्मा की पत्नियां सावित्री और गायत्री : ब्रह्मा की पहली पत्नी का नाम सावित्री थीं। ब्रह्मा ने एक और स्त्री से विवाह किया था जिसका नाम गायत्री है। जाट इतिहास अनुसार यह गायत्री देवी राजस्थान के पुष्कर की रहने वाली थी जो वेदज्ञान में पारंगत होने के कारण विख्यात थी। पुष्कर में ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था और उस वक्त उनकी पत्नीं सावित्री उनके साथ नहीं थी। यज्ञ का मुहूर्त निकला जा रहा था ऐसे में ब्रह्माजी ने गायत्री से विवाह कर यज्ञ प्रारंभ किया लेकिन जब सावित्री वहां पहुंची तो उन्होंने बगल में गायत्री को बैठा देखकर ब्रह्माजी को श्राप दे दिया।

माता सरस्वती के बारे में: पुराणों में सरस्वती के बारे में भिन्न-भिन्न मत मिलते हैं। पुराणों में ब्रह्मा के मानस पुत्रों का जिक्र है लेकिन सरस्वतीजी ब्रह्माजी की पुत्रीरूप से प्रकट हुईं ऐसा कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है। एक अन्य पौराणिक उल्लेख अनुसार देवी महालक्ष्मी (लक्ष्मी नहीं) से जो उनका सत्व प्रधान रूप उत्पन्न हुआ, देवी का वही रूप सरस्वती कहलाया।

सरस्वती उत्पत्ति कथा : हिन्दू धर्म के दो ग्रंथों ‘सरस्वती पुराण’ और ‘मत्स्य पुराण’ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का सरस्वती से विवाह करने का प्रसंग है जिसके फलस्वरूप इस धरती के प्रथम मानव ‘मनु’ का जन्म हुआ। कुछ विद्वान मनु की पत्नीं शतरूपा को ही सरस्वती मानते हैं। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

सरस्वती उत्पत्ति कथा मत्स्य पुराण अनुसार : मत्स्य पुराण में यह कथा थोड़ी सी भिन्न है। मत्स्य पुराण अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। कालांतर में उनका पांचवां सिर शिवजी ने काट दिया था जिसके चलते उनका नाम कापालिक पड़ा। एक अन्य मान्यता अनुसार उनका ये सिर काल भैरव ने काट दिया था।
कहा जाता है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया। ब्रह्मा अपनी ही बनाई हुई रचना, सरवस्ती के प्रति आकर्षित होने लगे और लगातार उन पर अपनी दृष्टि डाले रखते थे। ब्रह्मा की दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती चारों दिशाओं में छिपती रहीं लेकिन वह उनसे नहीं बच पाईं। इसलिए सरस्वती आकाश में जाकर छिप गईं, लेकिन अपने पांचवें सिर से ब्रह्मा ने उन्हें आकाश में भी खोज निकाला और उनसे सृष्टि की रचना में सहयोग करने का निवेदन किया। सरस्वती से विवाह करने के पश्चात सर्वप्रथम स्वयंभु मनु को जन्म दिया। ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान मनु को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है।

मान्यता अनुसार सरस्वती ने वेदज्ञ पुरूरवा से भी संबंध बनाए थे जिसके चलते उनको एक पुत्र हुआ जिसका नाम ‘सरस्वान्’ रखा गया। जब ब्रह्मा को इसका पता चला तो उन्होंने सरस्वती को महानदी होने का शाप दे दिया। भयभीता सरस्वती गंगा मां की शरण में जा पहुंची। गंगा के कहने पर ब्रह्मा ने सरस्वती को शाप-मुक्त कर दिया। शापवश ही वह मृत्युलोक में कहीं दृश्य और कहीं अदृश्य रूप में रहने लगी।

पांचवां सिर : एक पौराणिक कथा के अनुसार, रति देवी के पति कामदेव को तप करने के बाद ब्रह्माजी ने तीन ऐसे तीर प्रदान किए जिससे किसी को भी कामासक्त किया जा सकता था। कामदेव ने उन तीरों की शक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक तीर ब्रह्माजी पर ही छोड़ दिया। ऐसे में ब्रह्माजी पर इसका असर हुआ और उन्होंने अपनी संकल्प शक्ति से शतरूपा देवी का सृजन किया। ब्रह्माजी अपने द्वारा उत्पन्न शतरूपा के प्रति आकृष्ट हो गए तथा उन्हें टकटकी बांध कर निहारने लगे। शतरूपा ने ब्रह्मा की दृष्टि से बचने की हर कोशिश की किंतु असफल रहीं। ऐसे में शतरूपा ऊपर की ओर देखने लगीं तो ब्रह्माजी अपना एक सिर ऊपर की विकसित कर दिया।

भगवान शिव ब्रह्माजी की इस हरकत को देख रहे थे। शिव की दृष्टि में शतरूपा ब्रह्मा की पुत्री सदृश थीं इसीलिए उन्हें यह घोर पाप लगा। इससे क्रुद्ध होकर शिवजी ने ब्रह्मा का सिर काट डाला। भगवान शिव द्वारा काटा गया पांचवां सिर बद्रीनाथ परिक्षेत्र में गिरा। यह स्थान आज ब्रह्म कपाल के रूप में विख्यात है। यहां पर लोग अपने पितरों का तर्पण एवं पिण्डदान करके उन्हें मोक्ष प्राप्त होने की कामना करते हैं।

भगवान शिव ने इसके अतिरिक्त भी ब्रह्माजी को शाप के रूप में दंड दिया। इस शाप के अनुसार त्रिदेवों में शामिल ब्रह्मा जी की पूजा-उपासना नहीं होगी। शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मा और शतरूपा के संयोग से ही स्वयंभू मनु का जन्म हुआ और इन्हीं मनु से मानव की उत्पत्ति हुई।