देश की आजादी की लड़ाई भारतीय इतिहास में एक दौरा एैसा था जब आंग्रेजों ने अपना सारे ताकत लगाने के लिए मजबूर होना पडा। बात 1905 से 1933 तक इसी भारत में एक तरफ गांधी जी का अहिंसा का राज​नीति जारी था वहीं दूसरी तरफ देश को आजदी दिलाने के लिये वैप्लवीक आन्दलोन तेजि से उबर रहा था। इस 28 साल में कोई बडे से बडे घटनाओं का साक्षी है इतिहास । कहा जाता है कि आज़ादी की लड़ाई में जिस सशस्त्र फौज़ की कमान नेता सुभाष चंद्र बोस ने सम्भाली, उसकी नींव साल 1915 में जतिंद्रनाथ मुख़र्जी ने रखी थी। वही जतिंद्रनाथ, जिन्हें लोग ‘बाघा जतिन’ के नाम से भी पुकारते हैं।

इस भारतीय क्रांतिकारी की मृत्यु के बाद एक ब्रिटिश अधिकारी ने उनके लिए कहा था,
“अगर यह व्यक्ति जिवित होता तो शायद पूरी दुनिया का नेतृत्व करता”

कुछ ऐसी ही प्रतिभा थी जतिंद्रनाथ की, देश के आम लोगों के लिए वे मसीहा थे, तो क्रांतिकारियों का गुरुर और अंग्रेज उनसे खौफ़ खाते थे। यही वे क्रांतिकारी थे जिन्होंने इंग्लैंड के प्रिंस ऑफ़ वेल्स के सामने ही अंग्रेजी अधिकारियों को पीटा था।

जतिंद्रनाथ मुख़र्जी का जन्म बंगाल के कायाग्राम, कुष्टिया जिला (जो अब बांग्लादेश में है) में 7 दिसंबर 1879 को हुआ था। उन्होंने पाँच साल की छोटी उम्र में ही पिता को खो दिया और माँ के लाड़-प्यार के साथ बड़े हुए। अपने परिवार का खर्च चलाने केलिए वे स्टेनोग्राफी सीखकर कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए।

बचपन से ही शरीर से हष्ट-पुष्ट, जतिंद्र में साहस की भी कोई कमी नहीं थी। जब भी किसी ग़रीब के साथ गलत होता देखते तो उनकी आवाज़ स्वयं ही बुलंद हो जाती थी। बताया जाता है कि साल 1906 में सिर्फ 27 साल की उम्र में उनका सामना एक खूंखार बाघ से हो गया था। और उन्होंने देखते ही देखते उस बाघ को मार गिराया। बस तभी से लोग उन्हें ‘बाघा जतिन’ बुलाने लगे।

उनकी सोच अपने समय से बहुत आगे थी। कॉलेज में पढ़ते हुए, उन्होंने सिस्टर निवेदिता के साथ राहत-कार्यों में भाग लेने लगे।सिस्टर निवेदिता ने ही उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से करवाई। ये स्वामी विवेकानन्द ही थे, जिन्होंने जतिंद्रनाथ को एक उद्देश्य दिया और अपनी मातृभूमि के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया। उन्हीं के मार्गदर्शन में जतिंद्रनाथ ने उन युवाओं को आपस में जोड़ना शुरू किया जो आगे चलकर भारत का भाग्य बदलने का जुनून रखते थे।

इसके बाद वे श्री. अरबिंदो के सम्पर्क में आये। जिसके बाद उनके मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ विद्रोह की भावना और भी प्रबल हो गयी। अरबिंदो ने ही उन्हें युवाओं की एक ‘गुप्त संस्था’ बनाने की प्रेरणा दी थी। यहीं से नींव रखी गयी नौजवानों की मशहूर ‘जुगांतर पार्टी’ की और इसकी कमान बाघा जतिन ने खुद सम्भाल ली।

उस समय देश में अंग्रेजों के खिलाफ़ उथल-पुथल पहले ही शुरू हो चुकी थी। ऐसे में बाघा जतिन ने ‘आमरा मोरबो, जगत जागबे’ का नारा दिया, जिसका मतलब था कि ‘जब हम मरेंगे तभी देश जागेगा’! उनके इस साहसी कदम से प्रेरित होकर बहुत से युवा जुगांतर पार्टी में शामिल हो गये।

जल्द ही जुगांतर के चर्चे भारत के बाहर भी होने लगे। अन्य देशों में रह रहे क्रांतिकारी भी इस पार्टी से जुड़ने लगे। अब यह क्रांति बस भारत तक ही सिमित नहीं थी, बल्कि पूरे विश्व में अलग-अलग देशों में रह रहे भारतीयों को जोड़ चुकी थी।

बाघा जतिन ने हिंसात्मक तरीके से ‘पूर्ण स्वराज’ प्राप्त करने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई। वे अंग्रेजों को उनकी ही भाषा में जवाब देना चाहते थे। वे कभी भी भारतीयों का अपमान करने वाले अंग्रेजों को पीटने से नहीं चुकते थे।

साल 1905 में जब कोलकाता में प्रिंस ऑफ़ वेल्स का दौरा हुआ। कहा जाता है कि जब प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत जुलूस निकल रहा था तो एक गाड़ी की छत पर कुछ अंग्रेज़ बैठे हुए थे और उनके जूते खिड़कियों पर लटक रहे थे, गाड़ी में बैठी महिलाओं के बिल्कुल मुंह पर। इसे देख जतिन भड़क गए और उन्होंने अंग्रेजों से उतरने को कहा, लेकिन वो नहीं माने तो बाघा जतिन खुद ऊपर चढ़ गये और एक-एक करके सबको पीट दिया। तब तक पीटा जब तक कि सारे अंग्रेज नीचे नहीं गिर गए।

यह घटना प्रिंस ऑफ़ वेल्स के सामने हुई। जब छानबीन करने के लिए कहा गया तो बाघा जतिन बिल्कुल निर्भीक खड़े थे। बाद में अंग्रेजों को ही दोषी पाया गया। इस एक घटना ने पूरी दुनिया को भारतीयों के साथ अंग्रेजों के दुर्व्यवहार के बारे में बता दिया और साथ ही, भारतीयों के मन से अंग्रेजों के डर को भी बहुत हद तक हटा दिया था।

अंग्रेज अधिकारी हमेशा ही बाघा जतिन से बचने की कोशिश करते और उन्हें फंसाने के षड्यंत्र रचते रहते थे। साल 1908 में, बंगाल में कई क्रांतिकारियों को मुजफ्फरपुर में अलीपुर बम प्रकरण में आरोपित किया गया, पर फिर भी जतिन्द्रनाथ मुखर्जी आज़ाद थे। उन्होंने गुप्त रूप से देशभर के क्रांतिकारियों को जोड़ना शुरू किया।

बाघा जतिन ने बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश भर में विभिन्न शहरों में क्रांतिकारियों की विभिन्न शाखाओं के बीच मजबूत संपर्क स्थापित किया। यह वह समय था जब वरिष्ठ नेताओं के सलाखों के पीछे जाने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ़ बंगाल क्रांति के नए नेता के रूप में उभरे थे बाघा जतिन। बंगाल में उग्रवादी क्रांतिकारी नीति शुरू करने का श्रेय भी बाघा जतिन को जाता है।

उन्हें 27 जनवरी,1910 को गिरफ्तार किया गया था, हालांकि उनके खिलाफ़ कोई ठोस प्रमाण न मिलने के कारण उन्हें कुछ दिनों के बाद छोड़ दिया गया।

जेल से अपनी रिहाई के बाद, बाघा जतिन ने राजनीतिक विचारों और विचारधाराओं के एक नए युग की शुरूआत की। उनकी भूमिका इतनी प्रभावशाली रही कि क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने बनारस से कलकत्ता स्थानांतरित होकर जतिन्द्रनाथ मुखर्जी के नेतृत्व में काम करना शुरू कर दिया था।

उस वक्त कोलकाता अंग्रेजों की राजधानी थी। लेकिन अंग्रेज सरकार बाघा जतिन और उनके क्रांतिकारी दल से तंग आ गई थी, उन्हें अब कोलकाता सुरक्षित नहीं लग रहा था। अंग्रेजों ने अगर अपनी राजधानी 1912 में कोलकाता से बदलकर दिल्ली बनाई तो इसकी बड़ी वजह ये क्रांतिकारी ही थे, उनमें शायद सबसे बड़ा नाम बाघा जतिन का था।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद, उनकी जुगांतर पार्टी ने बर्लिन समिति और जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीयों को अंग्रेजो के जर्मनी का समर्थन भी बाघा जतिन के नेतृत्व के चलते ही मिला था।हालांकि पार्टी और उनकी गतिविधियों पर ब्रिटिश पुलिस की नज़र थी और इस वजह से, बाघा जतिन को अप्रैल 1915 में उड़ीसा में बालासोर जाना पड़ा।

यहाँ रहने के लिए उन्होंने उड़ीसा तट चुना क्योंकि यहाँ पर जर्मन हथियार पहुँचाना आसान था। उन्होंने हथियार इकट्ठा कर अंग्रेजों के खिलाफ़ जंग छेड़ने की योजना बनाई थी। लेकिन इस योजना का खुलासा एक एजेंट ने ब्रिटिश सरकार के सामने कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस चौकन्नी हो गयी थी।

जैसे ही जर्मनी के साथ जतिन की भागीदारी के बारे में ब्रिटिश अधिकारियों को पता चला, उन्होंने तत्काल कार्यवाही से गंगा के डेल्टा क्षेत्रों, उड़ीसा के चटगांव और नोआखाली तटीय क्षेत्रों को सील कर दिया। पुलिस खुफिया विभाग की एक इकाई को बालासोर में जतिन्द्रनाथ मुखर्जी के ठिकाने की खोज करने के लिए भेजा गया।

बाघा जतिन को अंग्रेजों द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में पता चला और उन्होंने अपने छिपने का स्थान छोड़ दिया। उड़ीसा के जंगलों और पहाड़ियों में चलने के दो दिनों के बाद वे बालासोर रेलवे स्टेशन तक पहुँचे। लेकिन अब न केवल ब्रिटिश बल्कि वहां के गाँववालों को भी बाघा जतिन और उनके साथियों की तलाश थी क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने ‘पाँच डाकुओं’ के बारे में जानकारी देने वाले को इनाम देने की घोषणा की थी।

9 सितंबर 1915 को जतिन्द्रनाथ मुखर्जी और उनके साथियों ने बालासोर में चाशाखंड क्षेत्र में एक पहाड़ी पर बारिश से बचने के लिए आश्रय लिया। हालांकि, चित्ताप्रिया और अन्य साथियों ने बाघा जतिन से आग्रह किया कि वे वहां से निकल जाएँ। लेकिन जतिन ने अपने दोस्तों को खतरे में अकेला छोड़कर जाने से इनकार कर दिया।

इन पाँच क्रांतिकारियों और ब्रिटिश पुलिस के बीच 75 मिनट चली मुठभेड़ में अनगिनत ब्रिटिश घायल हुए तो क्रांतिकारियों में चित्ताप्रिया रे चौधरी की मृत्यु हो गई। जतिन और जतिश गंभीर रूप से घायल हो गए थे और जब गोला बारूद ख़त्म हो गया तो मनोरंजन सेनगुप्ता और निरेन पकड़े गए।

बाघा जतिन को बालासोर अस्पताल ले जाया गया जहां उन्होंने 10 सितंबर, 1915 को अपनी अंतिम सांस ली। लोग मानते हैं कि यदि बाघा जतिन की योजना सफ़ल हो गयी होती तो भारत 1915 में ही स्वतंत्र हो जाता। कोलकाता पुलिस के डिटेक्टिव डिपार्टमेंट के हेड और बंगाल के पुलिस कमिश्नर रहे चार्ल्स टेगार्ट ने कहा था कि अगर बाघा जतिन अंग्रेज होते तो अंग्रेज लोग उनका स्टेच्यू लंदन में ट्रेफलगर स्क्वायर पर नेलशन के बगल में लगवाते। पर आज शायद ही कोई इस महान क्रांतिकारी को जानता हो।

भारत माँ के इस सपूत के लिए बस इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसे व्यक्तित्व इस दुनिया में विरले ही जन्म लेते है।
Edit By : Chandan Das